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वामन अवतार और राजा बलि
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, अष्टम स्कंध (अध्याय 15–23)
भक्त प्रह्लाद के पौत्र बलि असुरों के राजा थे: वीर, दानी और वचन के पक्के। गुरु शुक्राचार्य की कृपा और यज्ञ के बल से उन्होंने इंद्र को हराकर स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया।
स्वर्ग छिन जाने से देवमाता अदिति बहुत दुखी हुईं। पति कश्यप ऋषि के कहने पर उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना में पयोव्रत किया। भगवान प्रसन्न हुए और बोले, “मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा।”
भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को अदिति की गोद में भगवान ने एक नन्हे बालक के रूप में जन्म लिया: वामन। उपनयन के बाद वे छाता, दंड और कमंडल लिए एक तेजस्वी ब्रह्मचारी बन गए।
उन्हीं दिनों राजा बलि नर्मदा के उत्तर तट पर भृगुकच्छ में एक महान अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। वामन वहाँ पहुँचे। उनका तेज देखकर बलि ने उठकर उनका स्वागत किया, चरण धोए और कहा, “ब्राह्मण देव, जो चाहें माँग लीजिए: गाँव, धन, हाथी, कन्या।”
वामन मुस्कुराए: “राजन, मुझे बस अपने पैरों से नापी हुई तीन पग भूमि चाहिए।” बलि हँसे, “बस इतना? कुछ और माँगिए।” पर वामन बोले, “संतोषी ब्राह्मण के लिए इतना ही बहुत है।”
बलि संकल्प का जल लेने को हुए ही थे कि गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें रोका: “राजन, ये कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं विष्णु हैं! ये तीन पग में तुम्हारा सब कुछ ले लेंगे।”
बलि ने शांत स्वर में कहा, “गुरुदेव, मैंने वचन दे दिया है। प्रह्लाद का पौत्र होकर मैं वचन से नहीं फिरूँगा।” उन्होंने संकल्प का जल छोड़ा… और उसी क्षण वामन का शरीर बढ़ने लगा, बढ़ता ही गया।
देखते-देखते वामन त्रिविक्रम बन गए। उनका शरीर धरती, आकाश और दिशाओं में फैल गया। पहले पग में उन्होंने बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, और दूसरे पग में स्वर्ग और उसके ऊपर के सारे लोक।
तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा। भगवान बोले, “राजन, तुमने तीन पग का वचन दिया था। तीसरा पग कहाँ रखूँ?” असुर सेना क्रोध में भर उठी, पर बलि ने उन्हें रोक दिया।
गरुड़ ने भगवान की इच्छा जानकर बलि को वरुण पाश में बाँध दिया। बँधे हुए बलि ने भी धैर्य नहीं छोड़ा। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।”
बलि बोले, “धन छिन जाने से मुझे उतना दुख नहीं, जितना वचन टूटने से होता। आपने मेरा अहंकार लेकर मुझ पर कृपा ही की है।”
तभी भक्त प्रह्लाद वहाँ आए। उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और कहा, “प्रभु, आपने ही बलि को ऐश्वर्य दिया था, और आपने ही ले लिया। यह भी आपकी कृपा है।” ब्रह्मा जी और बलि की पत्नी विंध्यावली ने भी बलि के लिए प्रार्थना की।
भगवान प्रसन्न होकर बोले, “बलि ने सब कुछ खोकर भी सत्य नहीं छोड़ा। मैं इसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ सुतल लोक का राज्य देता हूँ। अगले सावर्णि मन्वंतर में यह इंद्र बनेगा।”
और फिर भगवान ने वह कहा जो किसी भक्त के लिए सबसे बड़ा वरदान है: “मैं स्वयं हाथ में गदा लेकर सुतल में तुम्हारे द्वार पर रक्षक बनकर रहूँगा।”
बलि ने भगवान को प्रणाम किया और अपने परिवार के साथ आनंदपूर्वक सुतल लोक चले गए। इंद्र को स्वर्ग वापस मिला, और देवमाता अदिति की प्रार्थना पूरी हुई।
इस कथा का संदेश
बलि ने राज्य खोया, पर वचन नहीं। सत्य और समर्पण से उसने वह पाया जो कोई राज्य नहीं दे सकता: भगवान का सान्निध्य।
भागवत के अनुसार वामन जयंती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को मनाई जाती है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, यानी दीपावली के अगले दिन (गोवर्धन पूजा के दिन), महाराष्ट्र और कई क्षेत्रों में बलि प्रतिपदा मनाई जाती है, और केरल में ओणम राजा बलि के स्वागत का पर्व माना जाता है। शुक्राचार्य की एक आँख जाने का प्रसंग लोक कथाओं में मिलता है, भागवत में नहीं।
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