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उत्पन्ना एकादशी: एकादशी देवी का प्राकट्य

स्रोत: पारंपरिक एकादशी व्रत कथा (एकादशी माहात्म्य)

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभु, एकादशी का व्रत सब व्रतों में इतना श्रेष्ठ क्यों है? यह तिथि पहली बार कैसे प्रकट हुई?” श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, “राजन, इसकी कथा सुनो।”

सतयुग में मुर नाम का एक भयंकर असुर था, असुर नाड़ीजंघ का पुत्र। उसने अपने बल से देवताओं को हराकर स्वर्ग से निकाल दिया। इंद्र और सारे देवता पृथ्वी पर मारे-मारे फिरने लगे।

दुखी देवता पहले भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने कहा, “तुम सब जगत के पालनहार भगवान विष्णु की शरण में जाओ।” देवताओं ने क्षीरसागर पहुँचकर भगवान विष्णु की स्तुति की और अपनी व्यथा सुनाई।

भगवान विष्णु देवताओं के साथ मुर की नगरी चंद्रावती पहुँचे। भयंकर युद्ध छिड़ा। भगवान ने असंख्य असुरों का संहार किया, पर मुर से उनका युद्ध बहुत लंबे समय तक चलता रहा। कथा कहती है कि यह युद्ध हज़ार दिव्य वर्षों तक चला।

अंत में भगवान युद्ध छोड़कर विश्राम के लिए बदरिकाश्रम गए और वहाँ हेमवती नाम की एक सुंदर गुफा में योगनिद्रा में लेट गए।

पर मुर ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। वह उन्हें ढूँढता हुआ उसी गुफा में आ पहुँचा। भगवान को सोया देखकर वह मन ही मन हँसा: “आज मैं इस देवताओं के रक्षक का ही अंत कर दूँगा।”

उसने अपना शस्त्र उठाया और सोते हुए भगवान विष्णु की ओर बढ़ा… तभी गुफा एक अद्भुत प्रकाश से भर उठी।

भगवान विष्णु के शरीर से एक अत्यंत तेजस्वी, सुंदर कन्या प्रकट हुई। उसके हाथों में दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे और आँखों में अग्नि-सा तेज।

मुर ने उस कन्या को देखा और अहंकार से उससे युद्ध करने लगा। पर देवी के सामने वह टिक न सका। कथा कहती है कि देवी के एक हुंकार से ही मुर जलकर भस्म हो गया।

तभी भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागे। उन्होंने भस्म हुए मुर को देखा और आश्चर्य से पूछा, “इस महाबली असुर का वध किसने किया?”

कन्या ने हाथ जोड़कर कहा, “स्वामी, मैं आपके ही शरीर से उत्पन्न आपकी शक्ति हूँ। यह असुर आपको सोते हुए मारना चाहता था, इसलिए मैंने इसका अंत किया।” मुर के अंत का समाचार पाकर देवता आनंद से भर उठे, और उन्हें उनका खोया स्वर्ग फिर से मिल गया।

भगवान प्रसन्न हुए और बोले, “देवी, तुम मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रकट हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। कोई वर माँगो।”

एकादशी देवी ने अपने लिए नहीं, जगत के लिए माँगा: “प्रभु, जो भी मनुष्य इस तिथि को श्रद्धा से उपवास करे, उसके पाप नष्ट हों और उसे आपकी भक्ति मिले।”

भगवान ने कहा, “तथास्तु। आज से तुम सब तिथियों में मुझे सबसे प्रिय होगी। जो तुम्हारा व्रत करेगा, वह मेरी कृपा का पात्र होगा।”

तभी से यह एकादशी उत्पन्ना एकादशी कहलाती है, क्योंकि इसी दिन एकादशी देवी उत्पन्न हुईं। जो भक्त वर्ष भर एकादशी व्रत आरंभ करना चाहते हैं, वे परंपरा से इसी एकादशी से शुरुआत करते हैं। इस दिन भक्त भगवान विष्णु के साथ एकादशी देवी का भी कृतज्ञता से स्मरण करते हैं।

इस कथा का संदेश

जब भक्त सोया हो, तब भी भगवान की शक्ति जागती है। एकादशी देवी ने अपने लिए नहीं, सबके कल्याण के लिए वर माँगा।

उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष में आती है, और परंपरा से एकादशी व्रत का आरंभ इसी से किया जाता है। इस दिन उपवास, भगवान विष्णु व एकादशी देवी की पूजा और रात्रि जागरण की परंपरा है, और द्वादशी को पारण किया जाता है। यह कथा एकादशी माहात्म्य के रूप में प्रचलित है; इसका स्रोत कहीं भविष्योत्तर पुराण और कहीं पद्म पुराण बताया जाता है, और कुछ रूपों में गुफा का नाम सिंहावती मिलता है।

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