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सुदामा और कृष्ण

स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध (अध्याय 80–81)

भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के एक मित्र थे, एक ब्राह्मण। दोनों ने उज्जैन में गुरु सांदीपनि के आश्रम में साथ विद्या पाई थी। परंपरा उन्हें सुदामा के नाम से जानती है।

सुदामा वेदों के ज्ञाता थे, शांत और संतोषी। पर घर में घोर दरिद्रता थी। जो भिक्षा में मिल जाता, उसी से गुज़ारा चलता। उनकी पत्नी भी सहनशील थी, पर भूख से दुबली हो चुकी थी।

एक दिन पत्नी ने काँपते स्वर में कहा, “स्वामी, द्वारका के राजा श्रीकृष्ण आपके सखा हैं। वे ब्राह्मणों के हितैषी हैं और शरण में आए को कभी खाली नहीं लौटाते। एक बार उनके पास जाइए।”

सुदामा को माँगना अच्छा नहीं लगता था। पर उन्होंने सोचा, “धन मिले न मिले, कृष्ण के दर्शन तो होंगे। यही सबसे बड़ा लाभ है।” फिर प्रश्न उठा कि मित्र के पास खाली हाथ कैसे जाएँ? पत्नी ने पड़ोस के ब्राह्मणों से माँगकर चार मुट्ठी चिउड़ा लाकर एक पुराने कपड़े में बाँध दिया।

द्वारका के महलों की चमक देखकर सुदामा सकुचा गए। पर जैसे ही श्रीकृष्ण ने उन्हें देखा, वे रुक्मिणी जी के पलंग से उठे और दौड़कर अपने मित्र को गले लगा लिया। उनकी आँखों से आनंद के आँसू बह चले।

कृष्ण ने उन्हें अपने आसन पर बिठाया, स्वयं उनके पैर धोए और वह जल अपने सिर पर लगाया। रुक्मिणी जी स्वयं चँवर डुलाने लगीं। महल के लोग चकित थे: इस मैले वस्त्रों वाले ब्राह्मण ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है?

दोनों मित्र गुरुकुल के दिन याद करते रहे। फिर कृष्ण मुस्कुराए: “मित्र, घर से मेरे लिए क्या लाए हो?” सुदामा ने लज्जा से सिर झुका लिया और वह छोटी-सी पोटली और कसकर छिपा ली…

कृष्ण सबके मन की जानते हैं। वे समझ गए कि यह मित्र धन के लिए नहीं आया, पत्नी का मन रखने आया है। उन्होंने मन में निश्चय किया: इसे वह संपदा दूँगा जो देवताओं को भी दुर्लभ है।

फिर उन्होंने स्वयं ही पोटली खींच ली और प्रसन्न होकर बोले, “अरे मित्र, यह तो मेरे लिए सबसे प्रिय उपहार है! प्रेम से लाया यह चिउड़ा मुझे ही नहीं, पूरे संसार को तृप्त कर देगा।”

उन्होंने एक मुट्ठी खाई। जैसे ही दूसरी मुट्ठी उठाई, रुक्मिणी जी ने उनका हाथ थाम लिया: “प्रभु, इतना ही बहुत है। इसी से इन्हें इस लोक और परलोक की सारी संपदा मिल जाएगी।”

सुदामा वह रात महल में सुख से रहे। सुबह विदा हुए तो कृष्ण कुछ दूर तक उन्हें छोड़ने आए। सुदामा ने कुछ नहीं माँगा, और उन्हें लगा कि कृष्ण ने भी कुछ नहीं दिया।

रास्ते में वे सोचते रहे: “कहाँ मैं दरिद्र, और कहाँ लक्ष्मीपति कृष्ण! उन्होंने मुझे भाई की तरह गले लगाया। शायद धन इसलिए नहीं दिया कि कहीं धन पाकर मैं उन्हें भूल न जाऊँ। यह भी उनकी कृपा ही है।”

पर जब वे अपने गाँव पहुँचे, तो वहाँ उनकी झोपड़ी नहीं थी। उसकी जगह सूर्य-से चमकते महल थे, सुंदर उपवन थे, सरोवर थे, सेवक-सेविकाएँ थे। सुदामा सोच में पड़ गए: यह किसका स्थान है?

तभी उनकी पत्नी, सुंदर वस्त्र-आभूषणों में, आनंद से उनकी अगवानी करने आईं। सुदामा समझ गए: “मेरे मित्र ने बिना कहे सब दे दिया, जैसे बादल बिना कहे बरस जाता है।”

इतना वैभव पाकर भी सुदामा का मन नहीं बदला। उन्होंने यही प्रार्थना की कि हर जन्म में उन्हें कृष्ण की मित्रता और उनके भक्तों का संग मिले। भोगों में अनासक्त रहकर वे जीवन भर भगवान का भजन करते रहे।

इस कथा का संदेश

भगवान उपहार का मूल्य नहीं, देने वाले का प्रेम देखते हैं। जो निश्छल मन से, बिना माँगे जाता है, उसे बिना माँगे ही सब मिल जाता है।

भागवत में इस ब्राह्मण मित्र का नाम नहीं दिया गया है; उन्हें सुदामा कहना बाद की परंपरा है (दक्षिण भारत में वे कुचेल नाम से प्रसिद्ध हैं)। लोक मान्यता में अक्षय तृतीया को सुदामा-कृष्ण मिलन का दिन माना जाता है।

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