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शुंभ-निशुंभ और चंड-मुंड

स्रोत: मार्कण्डेय पुराण, देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय 5–10

शुंभ और निशुंभ नाम के दो असुर भाइयों ने अपने बल से इंद्र का राज्य, यज्ञ का भाग और सूर्य, चंद्र, कुबेर, यम और वरुण के अधिकार छीन लिए। देवता फिर से स्वर्ग से निकाल दिए गए।

तब देवताओं को देवी का वह वचन याद आया: “संकट में मुझे याद करोगे, तो मैं आऊँगी।” वे हिमालय पहुँचे और देवी की स्तुति करने लगे: “या देवी सर्वभूतेषु…”, जो देवी सब प्राणियों में शक्ति, बुद्धि, क्षमा और माता के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार।

उसी समय देवी पार्वती गंगा में स्नान करने आईं। उन्होंने पूछा, “तुम किसकी स्तुति कर रहे हो?” तभी उनके शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं और बोलीं, “यह स्तुति मेरी ही है।” पार्वती के शरीर-कोश से निकलने के कारण वे कौशिकी कहलाईं, और अंबिका भी।

शुंभ के दो सेवक, चंड और मुंड, उधर से गुज़रे। उन्होंने अंबिका का अद्भुत रूप देखा और जाकर शुंभ से कहा, “महाराज, तीनों लोकों के सारे रत्न आपके पास हैं। हिमालय पर एक ऐसी नारी है जो नारियों में रत्न है। वह भी आपकी होनी चाहिए।”

शुंभ ने सुग्रीव नाम के दूत को देवी के पास भेजा। दूत ने मीठे शब्दों में कहा, “तीनों लोकों के स्वामी शुंभ ने कहा है: मुझे या मेरे पराक्रमी भाई निशुंभ को पति के रूप में स्वीकार करो।”

देवी मुस्कुराईं। “तुमने सच कहा। पर मैंने पहले से एक प्रतिज्ञा कर रखी है। जो मुझे युद्ध में जीत ले, मेरा अभिमान दूर कर दे, और संसार में मेरे बराबर बलवान हो, वही मेरा पति होगा। शुंभ या निशुंभ स्वयं आएँ, मुझे जीतें और मेरा हाथ थामें।”

क्रोधित शुंभ ने सेनापति धूम्रलोचन को भेजा: “उसे बालों से पकड़कर ले आओ।” धूम्रलोचन आगे बढ़ा, पर देवी ने केवल “हुं” की ध्वनि की, और वह वहीं भस्म हो गया। देवी के सिंह ने उसकी सेना को नष्ट कर दिया।

अब शुंभ ने चंड और मुंड को बड़ी सेना के साथ भेजा। उन्हें आते देख अंबिका का मुख क्रोध से काला पड़ गया, और उनके ललाट से भयंकर रूप वाली काली प्रकट हुईं। हाथ में खट्वांग, गले में मुंडमाला, शरीर पर बाघ की खाल, और लाल जीभ बाहर निकली हुई।

काली असुर सेना पर टूट पड़ीं और देखते ही देखते उसे समाप्त कर दिया। फिर उन्होंने चंड और मुंड दोनों का सिर काट दिया और उन्हें लेकर अंबिका के पास आईं। अंबिका ने प्रसन्न होकर कहा, “चंड और मुंड को मारने के कारण तुम संसार में चामुंडा के नाम से प्रसिद्ध होगी।”

इसके बाद शुंभ ने अपनी पूरी सेना भेजी। देवताओं की शक्तियाँ देवी के साथ आ खड़ी हुईं, और रक्तबीज जैसे मायावी असुर का भी, जिसके रक्त की हर बूँद से नया असुर जन्मता था, देवी और चामुंडा ने अंत कर दिया।

अब निशुंभ स्वयं युद्ध में उतरा। भीषण युद्ध हुआ। देवी ने अपने शूल से उसका हृदय बींध दिया। उसके हृदय से एक और बलवान पुरुष निकला और बोला, “ठहरो!” देवी हँसीं और तलवार से उसका सिर काट दिया। निशुंभ धरती पर गिर पड़ा।

प्रिय भाई की मृत्यु से शुंभ क्रोध में पागल हो गया। उसने ताना मारा, “दुर्गे, तू घमंड मत कर। तू दूसरों के बल पर लड़ रही है।”

देवी ने उत्तर दिया, “इस संसार में मैं अकेली ही हूँ। मेरे सिवा दूसरा कौन है? देख, ये मेरी ही विभूतियाँ मुझमें समा रही हैं।” और ब्रह्माणी सहित सारी शक्तियाँ देवी के शरीर में लीन हो गईं। अब रणभूमि में केवल अंबिका थीं।

दोनों में भयंकर युद्ध हुआ, धरती पर भी और आकाश में भी। अंत में देवी ने शुंभ को घुमाकर धरती पर पटक दिया, और जब वह फिर उन पर झपटा, तो देवी ने शूल से उसकी छाती बींध दी। शुंभ के प्राण निकल गए।

जगत में शांति छा गई। नदियाँ अपने मार्ग पर बहने लगीं, हवा सुखद हो गई, और यज्ञ की अग्नियाँ फिर से प्रज्वलित हुईं। देवताओं ने आनंद से देवी की स्तुति की।

इस कथा का संदेश

अहंकार अनेक रूपों में लड़ता है, पर सत्य एक है। देवी सिखाती हैं कि सारी शक्तियाँ एक ही मूल शक्ति के रूप हैं।

यह कथा दुर्गा सप्तशती का उत्तम चरित्र है, जिसका पाठ नवरात्रि और विशेष रूप से दुर्गाष्टमी पर होता है। चामुंडा की पूजा अष्टमी-नवमी की संधि पूजा से भी जुड़ी है।

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