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शैलपुत्री
स्रोत: शिव पुराण, रुद्र संहिता, पार्वती खंड; नवदुर्गा परंपरा (दुर्गा सप्तशती का देवी कवच)
प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान सती सह न सकीं। उन्होंने योगाग्नि में अपना शरीर त्याग दिया। कैलाशपति शिव गहरे वैराग्य में डूब गए और हिमालय की एकांत चोटियों पर समाधि में बैठ गए।
उधर पर्वतराज हिमवान और उनकी पत्नी मेना जगदंबा के अनन्य भक्त थे। मेना ने बरसों तक श्रद्धा से देवी की उपासना की। एक दिन देवी प्रसन्न होकर प्रकट हुईं। मेना ने हाथ जोड़कर माँगा, “माँ, आप स्वयं मेरी पुत्री बनकर मेरे घर आइए।” देवी ने कहा, “तथास्तु।”
समय आने पर मेना की गोद में एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया। आकाश से फूल बरसे, दिशाएँ प्रसन्न हो उठीं। वही सती अब हिमालय की बेटी बनकर लौटी थीं। पर्वत की पुत्री होने से वे पार्वती कहलाईं, और शैल यानी पर्वत की पुत्री होने से शैलपुत्री।
पार्वती चंद्रमा की कला की तरह दिन-दिन बढ़ने लगीं। वे सखियों के साथ गंगा के तट पर खेलतीं, रेत की छोटी-छोटी वेदियाँ बनातीं। जो भी उन्हें देखता, यही सोचता कि यह कोई साधारण बालिका नहीं है।
एक दिन देवर्षि नारद हिमवान के महल में पधारे। हिमवान ने आदर से उनका स्वागत किया, पार्वती को उनके चरणों में प्रणाम करवाया और पूछा, “मुनिवर, मेरी पुत्री का भाग्य बताइए। इसका विवाह किससे होगा?”
नारद ने पार्वती का हाथ देखा और कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “राजन, यह कन्या सब शुभ लक्षणों से भरी है। पर इसकी हथेली में एक रेखा ऐसी है…”
“इसका पति योगी होगा। न उसकी माता होगी, न पिता। वह दिगंबर रहेगा, अमंगल वेश धारण करेगा, और उसे किसी मान-सम्मान की चाह नहीं होगी।” यह सुनते ही मेना और हिमवान के चेहरे का रंग उड़ गया।
हिमवान ने दुखी होकर पूछा, “मुनिवर, क्या इसका कोई उपाय है?” नारद मुस्कुराए। “राजन, चिंता मत कीजिए। जो लक्षण मैंने बताए, वे दोष नहीं हैं। वे सब एक ही देव में मिलते हैं: स्वयं भगवान शिव में।”
“शिव अजन्मा हैं, इसलिए उनके माता-पिता नहीं। वे योगीश्वर हैं, इसलिए उन्हें किसी मान की चाह नहीं। भस्म, सर्प और मृगचर्म उनका वेश है, पर वही सबका कल्याण करने वाले हैं। यह कन्या पूर्व जन्म में सती थी, और इस जन्म में भी शिव की ही अर्धांगिनी बनेगी।”
यह सुनकर मेना और हिमवान का मन शांत हुआ, और पार्वती के मन में आनंद की लहर दौड़ गई। मन ही मन उन्होंने शिव को अपना पति मान लिया।
पर एक कठिनाई थी। सती के वियोग के बाद शिव हिमालय पर ही गहरी तपस्या में लीन थे। वे संसार से विरक्त थे, और विवाह की बात उनके लिए बहुत दूर की थी।
हिमवान पार्वती को लेकर शिव के पास गए और विनती की कि उनकी पुत्री को सेवा का अवसर मिले। शिव ने पहले मना किया, क्योंकि तपस्वी के पास स्त्री का रहना उन्हें उचित नहीं लगा। पर पार्वती की नम्र और विवेक भरी बातों के बाद उन्होंने सेवा स्वीकार कर ली।
अब पार्वती रोज़ फूल, जल और कुशा लेकर आतीं, पूजा का स्थान स्वच्छ करतीं और मौन रहकर सेवा करतीं। यहीं से वह यात्रा शुरू हुई जो आगे उनकी कठोर तपस्या तक पहुँची, जिसकी कथा नवरात्रि के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी के रूप में पढ़ी जाती है।
नवरात्रि के पहले दिन देवी के इसी रूप की पूजा शैलपुत्री के नाम से होती है। उनके ध्यान-श्लोक में वर्णन है कि वे वृषभ पर सवार हैं, हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं और मस्तक पर अर्धचंद्र शोभित है। प्रचलित चित्रों में उनके दूसरे हाथ में कमल दिखाया जाता है।
शैलपुत्री यानी पर्वत की बेटी: पर्वत की तरह अडिग, पर माँ की तरह कोमल। जिस शक्ति ने एक जन्म में अपमान के आगे झुकने से इनकार किया, वही दूसरे जन्म में प्रेम और धैर्य के साथ फिर अपने लक्ष्य की ओर चल पड़ी।
इस कथा का संदेश
जो सच्चा है, वह खोता नहीं, रूप बदलकर लौट आता है। शैलपुत्री सिखाती हैं कि हर नई शुरुआत अडिग श्रद्धा से होती है।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पहले दिन, प्रतिपदा को, घटस्थापना के साथ माँ शैलपुत्री की पूजा होती है।
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