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शबरी के बेर
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अरण्य कांड (सर्ग 73–74)
सीता का हरण हो चुका था। उन्हें खोजते हुए श्रीराम और लक्ष्मण दक्षिण के घने वनों में भटक रहे थे। शाप से मुक्त होकर कबंध ने उन्हें राह दिखाई: “पंपा सरोवर के पास मतंग ऋषि का आश्रम है। वहाँ शबरी नाम की एक तपस्विनी रहती है। उससे अवश्य मिलिए।”
शबरी कोई रानी या ऋषिपत्नी नहीं थी। वह वन में रहने वाली एक साधारण स्त्री थी, जिसने वर्षों तक मतंग ऋषि के शिष्यों की सेवा की थी। उन्हीं की छाया में उसने तप करना सीखा और धर्म को समझा।
फिर वह दिन आया जब मतंग वन के ऋषि दिव्य लोकों को जाने लगे। जाते समय उन्होंने शबरी से कहा, “तुम यहीं रहना। एक दिन दशरथ-नंदन राम इस आश्रम में आएँगे। उनका आदर से सत्कार करना। उनके दर्शन से तुम्हें भी अक्षय लोक मिलेंगे।”
ऋषि चले गए और शबरी अकेली रह गई। कोई नहीं जानता था कि राम कब आएँगे। पर शबरी का विश्वास अडिग था। गुरु ने कहा है, तो प्रभु आएँगे ही।
वह पंपा के तट से तरह-तरह के वन्य फल-मूल चुनकर लाती और सँभालकर रखती, कि कहीं आज ही राम आ जाएँ। समय बीतता गया, ऋतुएँ बदलती रहीं, पर उसकी प्रतीक्षा कभी नहीं थकी।
और फिर एक दिन, आश्रम की ओर दो तेजस्वी युवक आते दिखाई दिए। वल्कल वस्त्र, कंधों पर धनुष, और मुख पर ऐसी शांति जैसी शबरी ने कभी नहीं देखी थी।
शबरी ने उन्हें देखा, और उसकी आँखें भर आईं। जिसकी राह उसने इतने वर्षों देखी थी, वह आज उसके द्वार पर खड़ा था…
शबरी उठ खड़ी हुई। उसने हाथ जोड़कर दोनों भाइयों के चरणों में प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनका स्वागत किया: पैर धोने को जल, आचमन का जल और बैठने को आसन।
राम ने आदर से पूछा, “हे तपोधने, तुम्हारे तप में कोई विघ्न तो नहीं आता? तुम्हारा क्रोध और आहार संयम में है न? क्या गुरुओं की सेवा का फल तुम्हें मिला? तुम्हारे मन में सुख है?”
शबरी ने कहा, “आज आपके दर्शन से मेरा तप सफल हो गया, मेरा जन्म सफल हो गया। आपकी पूजा करके मैं उन अक्षय लोकों को जाऊँगी जहाँ मेरे गुरु गए हैं।” फिर उसने प्रेम से कहा, “हे पुरुषश्रेष्ठ, आपके लिए मैंने पंपा के तट पर उगने वाले तरह-तरह के वन्य फल-मूल इकट्ठे करके रखे हैं।” और वे फल उसने श्रीराम को अर्पित किए।
राम ने कहा, “कबंध से मैंने तुम्हारे गुरुओं के महान प्रभाव के बारे में सुना है। यदि उचित समझो, तो मैं उसे अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।”
शबरी उन्हें मतंग वन दिखाने ले गई। उसने वह वेदी दिखाई जहाँ उसके गुरु पूजा करते थे, जो उनके तप के तेज से आज भी प्रकाशित थी। उसने बताया कि जब उपवास से दुर्बल गुरु तीर्थों तक नहीं जा पाते थे, तब उनके स्मरण मात्र से सातों समुद्रों का जल वहाँ आ गया था। उनके चढ़ाए फूल आज भी मुरझाए नहीं थे, और उनके धोकर टाँगे वल्कल वस्त्र आज भी सूखे नहीं थे।
सब दिखाकर शबरी ने हाथ जोड़े: “प्रभु, यह सब आपने देख लिया। अब आज्ञा दीजिए, मैं इस शरीर को छोड़कर उन्हीं ऋषियों के पास जाना चाहती हूँ जिनकी मैंने सेवा की।”
राम ने प्रसन्न होकर कहा, “तुमने मेरा बड़ा आदर किया। अब तुम जहाँ चाहो, सुख से जाओ।” आज्ञा पाकर शबरी ने अग्नि में अपने शरीर की आहुति दी और प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी रूप धारण कर उस पवित्र लोक को चली गई जहाँ उसके गुरु विराजते थे।
राम ने लक्ष्मण से कहा, “हमने यह पवित्र आश्रम देख लिया। अब चलें पंपा की ओर, जहाँ सुग्रीव रहते हैं।” शबरी के आश्रम से ही वह यात्रा आगे बढ़ी जो आगे चलकर सीता तक पहुँची।
इस कथा का संदेश
शबरी के पास न धन था, न पद। उसके पास था अटूट विश्वास और निष्काम प्रतीक्षा, और उसी ने भगवान को उसके द्वार तक ला दिया।
शबरी ने राम को चख-चखकर मीठे बेर खिलाए, यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है; यह बाद की भक्ति परंपरा और लोककथाओं से आया है। वाल्मीकि इतना ही कहते हैं कि शबरी ने राम के लिए पंपा तट के वन्य फल-मूल संचित किए थे। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को कई स्थानों पर शबरी जयंती मनाई जाती है।
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