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सावित्री और सत्यवान
स्रोत: महाभारत, वन पर्व (पतिव्रता माहात्म्य पर्व)
मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। अठारह वर्षों तक उन्होंने देवी सावित्री की उपासना की। देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें एक तेजस्वी पुत्री का वरदान मिला। राजा ने उसका नाम रखा: सावित्री।
सावित्री बड़ी हुई तो उसके तेज के कारण कोई राजकुमार उससे विवाह का प्रस्ताव लेकर आने का साहस नहीं कर सका। तब पिता ने कहा, “बेटी, तुम स्वयं अपना वर चुनो।”
सावित्री ने वन में रहने वाले सत्यवान को चुना, जो अंधे और राज्य से निकाले गए राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। जब यह बात देवर्षि नारद ने सुनी, तो वे चिंतित हो उठे: “राजन, सत्यवान गुणों में अद्वितीय है… पर उसकी आयु में केवल एक वर्ष शेष है।”
सबने सावित्री को समझाया। पर सावित्री ने शांत स्वर में कहा, “मैंने एक बार मन से जिसे चुन लिया, वही मेरा पति है।”
विवाह हुआ। सावित्री ने राजसी वस्त्र उतारकर वल्कल पहने और वन में सास-ससुर की सेवा करने लगी। दिन गिनती रही… और जब तीन दिन शेष रहे, उसने कठोर व्रत आरंभ किया।
चौथे दिन सत्यवान लकड़ी काटने वन में गए, और सावित्री भी साथ चली। अचानक सत्यवान के सिर में तीव्र पीड़ा उठी। वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए…
तभी सावित्री ने देखा: लाल वस्त्र पहने, हाथ में पाश लिए, एक तेजस्वी पुरुष सामने खड़ा था। “मैं यमराज हूँ।”
यमराज ने सत्यवान के शरीर से अंगूठे के आकार का प्राण-पुरुष निकाला, पाश में बाँधा और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी।
यमराज रुके। “पुत्री, लौट जाओ। तुम्हारे पति का समय पूरा हुआ। जहाँ तक कोई मनुष्य आ सकता है, तुम आ चुकी हो।”
सावित्री ने विनम्रता से कहा, “जहाँ मेरे पति जाते हैं, वहीं मेरा धर्म मुझे ले जाता है। सज्जनों के साथ सात कदम चलने से मित्रता हो जाती है। उसी मित्रता के नाते मेरी बात सुनिए।” और उसने धर्म पर ऐसी सारगर्भित बातें कहीं कि यमराज प्रसन्न हो गए।
“सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कोई भी वर माँग लो।”
सावित्री ने माँगा: मेरे ससुर की आँखों की ज्योति लौट आए। “तथास्तु।”
वह फिर भी पीछे चलती रही। यमराज ने दूसरा वर दिया, और उसने माँगा: मेरे ससुर को उनका खोया राज्य वापस मिले। “तथास्तु।”
तीसरा वर: मेरे पिता, जिनका कोई पुत्र नहीं, उन्हें सौ पुत्र हों। “तथास्तु।”
फिर भी सावित्री पीछे-पीछे चलती रही। उसकी धर्मनिष्ठ वाणी से यमराज का हृदय पिघल गया। “सत्यवान के प्राण छोड़कर एक और वर माँगो।”
सावित्री ने हाथ जोड़कर कहा: “मुझे सत्यवान से सौ तेजस्वी पुत्र हों।”
यमराज ने कहा, “तथास्तु”… और फिर ठिठक गए। सत्यवान के बिना सावित्री को सत्यवान से पुत्र कैसे होते? अपने ही वचन से बंधे यमराज मुस्कुराए, पाश खोला और सत्यवान के प्राण लौटा दिए। “कल्याणी, तुमने धर्म से मृत्यु को भी जीत लिया।”
सावित्री लौटकर आई। सत्यवान ऐसे जागे मानो गहरी नींद से उठे हों। आश्रम पहुँचे तो द्युमत्सेन की आँखों में ज्योति लौट आई थी, और कुछ ही समय में उनका राज्य भी उन्हें वापस मिल गया।
इस कथा का संदेश
सावित्री ने न रोकर माँगा, न लड़कर। उसने धैर्य, बुद्धि और धर्म से वह पा लिया जो असंभव था।
इसी कथा की स्मृति में सुहागिन स्त्रियाँ ज्येष्ठ अमावस्या (और कुछ परंपराओं में ज्येष्ठ पूर्णिमा) को वट सावित्री व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा कर पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
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