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सत्यनारायण कथा: साधु वैश्य
स्रोत: श्री सत्यनारायण व्रत कथा (स्कंद पुराण, रेवा खंड की मानी जाती है), तीसरा–चौथा अध्याय
रत्नपुर नगर में साधु नाम का एक धनी वैश्य (व्यापारी) रहता था। उसके पास सब कुछ था, बस संतान नहीं थी।
एक दिन वह व्यापार के लिए नाव लेकर जा रहा था। नदी किनारे उसने देखा कि राजा उल्कामुख अपनी रानी के साथ बड़े भक्ति भाव से सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन कर रहे हैं।
साधु ने पूछा, “राजन, यह कौन-सा व्रत है, इससे क्या मिलता है?” राजा बोले, “यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इससे मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। मैं संतान की कामना से यह व्रत कर रहा हूँ।”
साधु ने भी संकल्प लिया: “यदि मुझे संतान हुई, तो मैं भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करूँगा।” समय आने पर उसकी पत्नी लीलावती ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया कलावती।
लीलावती ने पति को वचन याद दिलाया। साधु बोला, “कलावती के विवाह पर करेंगे।” कलावती बड़ी हुई, कंचनपुर के एक योग्य वैश्य पुत्र से उसका विवाह हुआ, पर साधु फिर व्रत करना भूल गया।
फिर साधु अपने दामाद के साथ व्यापार करने राजा चंद्रकेतु के नगर रत्नसारपुर गया। वहाँ चोरों ने राजा का धन चुराया, और पीछा होते देख उसे वहीं फेंक भागे जहाँ साधु और उसका दामाद ठहरे थे। सिपाहियों ने दोनों को चोर समझकर पकड़ लिया और राजा ने उन्हें कारागार में डाल दिया।
उधर घर में भी चोरी हो गई। लीलावती और कलावती दाने-दाने को मोहताज हो गईं। एक दिन भूखी-प्यासी कलावती एक ब्राह्मण के घर पहुँची, तो देखा: वहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा हो रही थी…
कलावती ने कथा सुनी, प्रसाद लिया और घर आकर माँ को सब बताया। लीलावती को पति का भूला हुआ वचन याद आ गया। माँ-बेटी ने श्रद्धा से सत्यनारायण भगवान का व्रत किया और प्रार्थना की कि पति और दामाद घर लौट आएँ।
उसी रात भगवान ने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में कहा, “राजन, दोनों वैश्य निर्दोष हैं। उन्हें छोड़ दो।” सुबह राजा ने दोनों को मुक्त किया, क्षमा माँगी और ढेर सारा धन देकर सम्मान से विदा किया।
साधु धन से भरी नाव लेकर घर की ओर चला। रास्ते में भगवान सत्यनारायण एक दंडी संन्यासी के वेश में उसकी परीक्षा लेने आए और पूछा, “तुम्हारी नाव में क्या है?”
धन के अहंकार में और संन्यासी को कुछ देने से बचने के लिए साधु ने झूठ कहा, “इसमें तो केवल लता-पत्ते भरे हैं।” संन्यासी बोले, “तथास्तु।” और चले गए। साधु ने नाव देखी तो सचमुच उसमें धन की जगह लता-पत्ते भरे थे!
साधु अचेत-सा हो गया। दामाद ने कहा, “यह उस संन्यासी का ही प्रभाव है। चलिए, उनकी शरण में चलें।” साधु दौड़कर संन्यासी के चरणों में गिर पड़ा: “प्रभु, मैंने झूठ बोला। मुझे क्षमा करें।”
संन्यासी बोले, “तुमने बार-बार मेरा व्रत करने का वचन दिया और भुला दिया।” साधु ने रोते हुए अपनी भूल मानी और व्रत करने का पक्का संकल्प लिया। भगवान प्रसन्न हुए, और नाव फिर धन से भर गई। साधु ने वहीं सत्यनारायण भगवान का पूजन किया।
नाव नगर पहुँची। लीलावती ने समाचार भेजा। उस समय कलावती सत्यनारायण का पूजन कर रही थी। पति को देखने की उतावली में वह प्रसाद लिए बिना दौड़ पड़ी। तभी दामाद नाव सहित जल में अदृश्य हो गया।
सब रोने लगे। तभी आकाशवाणी हुई: “कलावती प्रसाद छोड़कर आई है। लौटकर प्रसाद ग्रहण करे, तो पति मिल जाएगा।” कलावती ने लौटकर श्रद्धा से प्रसाद लिया, और नाव सहित उसका पति फिर प्रकट हो गया।
उसके बाद साधु हर पूर्णिमा और संक्रांति को परिवार सहित सत्यनारायण भगवान का व्रत करने लगा, और सुखपूर्वक जीवन बिताया।
इस कथा का संदेश
भगवान का नाम ही सत्य है। वचन निभाना, सच बोलना और प्रसाद का आदर करना ही इस कथा की सीख है।
सत्यनारायण भगवान का व्रत और कथा परंपरा से पूर्णिमा के दिन, और किसी भी शुभ अवसर पर, की जाती है। पूजा में केले के पत्तों का मंडप, पंचामृत, तुलसी और सवा मात्रा में बना पंजीरी या शीरे का प्रसाद चढ़ाया जाता है, और कथा के पाँचों अध्याय सुनकर सब प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह कथा परंपरा से स्कंद पुराण के रेवा खंड की मानी जाती है, हालाँकि स्कंद पुराण के सभी संस्करणों में यह नहीं मिलती। कथा के कुछ नामों में संस्करणों के अनुसार थोड़ा अंतर मिलता है।
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