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समुद्र मंथन और लक्ष्मी का प्राकट्य
स्रोत: विष्णु पुराण, प्रथम अंश, अध्याय 9; श्रीमद्भागवत, अष्टम स्कंध, अध्याय 5–8
विष्णु पुराण की कथा है। एक बार महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर देवराज इंद्र को दिव्य फूलों की एक माला भेंट की। इंद्र उस समय ऐरावत हाथी पर सवार थे।
इंद्र ने वह माला ऐरावत के मस्तक पर रख दी। हाथी ने सुगंध से चिढ़कर उसे सूँड़ से उतारा और धरती पर फेंक दिया।
अपना दिया उपहार अपमानित होते देख दुर्वासा क्रोधित हो उठे। उन्होंने शाप दिया, “इंद्र, जिस वैभव के घमंड में तुमने यह किया, वह श्री तुम्हें और तीनों लोकों को छोड़ देगी।”
शाप फलित हुआ। स्वर्ग से लक्ष्मी चली गईं। देवता तेजहीन हो गए, यज्ञ बंद हो गए, और असुरों ने हमला करके देवताओं को हरा दिया।
दुखी देवता ब्रह्मा के साथ भगवान विष्णु की शरण में गए। विष्णु ने कहा, “असुरों से संधि करो, और मिलकर क्षीर सागर का मंथन करो। उससे अमृत निकलेगा, और खोई हुई लक्ष्मी भी लौटेंगी।”
मंदराचल मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी, और विष्णु ने कच्छप बनकर पर्वत को पीठ पर थामा। पहले हलाहल विष निकला, जिसे शिव ने पीकर सृष्टि की रक्षा की। फिर एक-एक करके रत्न निकलने लगे: कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष और अप्सराएँ।
मंथन चलता रहा। तभी सागर की लहरें अचानक शांत हो गईं, और जल के बीच से एक दिव्य प्रकाश उठने लगा, जैसे बिजली चमक उठी हो। सबकी साँसें थम गईं…
उस प्रकाश के बीच, कमल हाथ में लिए, स्वयं देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं। उनका रूप बिजली जैसा दीप्त था, और उन्हें देखकर देवता, असुर और ऋषि, सब मुग्ध हो गए।
भागवत बताता है कि इंद्र ने उन्हें बैठने के लिए दिव्य आसन दिया। नदियाँ सोने के कलशों में पवित्र जल लाईं, और दिशाओं के हाथियों ने उस जल से देवी का अभिषेक किया। सागर ने पीले रेशमी वस्त्र दिए, वरुण ने वैजयंती माला, और विश्वकर्मा ने आभूषण।
अब देवी अपने लिए वर चुनने निकलीं, हाथ में कमलों की माला लिए। उन्होंने सबको ध्यान से देखा। किसी में तप था, पर क्रोध नहीं गया था। किसी में ज्ञान था, पर आसक्ति थी। कोई महान था, पर काम को नहीं जीत पाया था। कोई दीर्घायु था, पर उसका स्वभाव शुभ नहीं था।
अंत में देवी ने भगवान विष्णु को देखा, जिनमें सारे शुभ गुण थे और जो किसी की अपेक्षा नहीं रखते थे। देवी ने कमलों की माला उन्हीं के गले में डाल दी। विष्णु ने उन्हें अपने वक्षस्थल पर स्थान दिया।
लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि पड़ते ही देवता फिर तेजस्वी हो उठे और तीनों लोकों में फिर से श्री और समृद्धि लौट आई। विष्णु पुराण में इंद्र देवी की स्तुति करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वे कभी तीनों लोकों को न छोड़ें।
इसके बाद मंथन से वारुणी देवी निकलीं, और अंत में देवताओं के वैद्य भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए।
धनतेरस, यानी कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाई जाती है, और इसी दिन से दीपावली के लक्ष्मी पूजन का उत्सव शुरू होता है। स्वास्थ्य और समृद्धि, दोनों इसी सागर-मंथन के वरदान हैं।
इस कथा का संदेश
लक्ष्मी अहंकार से रूठती हैं और परिश्रम, धैर्य और सद्गुण से लौटती हैं। वे वहीं ठहरती हैं जहाँ गुण स्थिर हों।
धनतेरस पर धन्वंतरि पूजा होती है, और संध्या को यम-दीप जलाया जाता है। दीपावली की अमावस्या को लक्ष्मी पूजन होता है। कई परंपराओं में लक्ष्मी के प्राकट्य को शरद पूर्णिमा से भी जोड़ा जाता है।
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