← Divine Astro
हिन्दी
WhatsApp पर भेजें

राजा हरिश्चंद्र का सत्य

स्रोत: मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 7–8 (हरिश्चंद्र उपाख्यान)

अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। उनके राज्य में न अकाल था, न रोग, न अधर्म।

एक दिन वन में शिकार खेलते हुए उन्हें स्त्रियों के रोने का स्वर सुनाई दिया। “डरो मत, मैं आ रहा हूँ!” कहते हुए राजा उस ओर दौड़े। वहाँ महर्षि विश्वामित्र साधना कर रहे थे, और राजा के इस हस्तक्षेप से उनकी साधना भंग हो गई। ऋषि क्रोधित हो उठे।

राजा ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और कहा कि राजा का धर्म दान देना है, ऋषि जो चाहें माँग लें। विश्वामित्र बोले, “तो अपना पूरा राज्य मुझे दे दो।” हरिश्चंद्र ने बिना हिचके सारा राज्य दान कर दिया।

फिर ऋषि ने कहा, “दान के साथ दक्षिणा भी देनी होती है।” राजा के पास अब कुछ नहीं बचा था। उन्होंने एक महीने का समय माँगा, और पत्नी शैव्या तथा छोटे पुत्र रोहिताश्व के साथ काशी चले गए।

महीना पूरा हुआ, पर दक्षिणा का प्रबंध न हुआ। तब शैव्या ने स्वयं कहा, “मुझे बेच दीजिए, पर अपना वचन मत तोड़िए।” भारी मन से राजा ने पत्नी को एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया; बालक रोहिताश्व भी माँ के साथ चला गया।

दक्षिणा फिर भी पूरी न हुई, तो हरिश्चंद्र ने स्वयं को एक चांडाल के हाथ बेच दिया। अयोध्या का राजा अब श्मशान का सेवक था, जिसका काम था हर दाह-संस्कार पर श्मशान का कर लेना।

एक रात श्मशान में एक स्त्री विलाप करती हुई आई। उसकी गोद में एक बालक का शव था, जिसे साँप ने डस लिया था। राजा कर माँगने आगे बढ़े… और उस स्त्री का स्वर उन्हें पहचाना-सा लगा।

वह शैव्या ही थीं, और गोद में उनका इकलौता पुत्र रोहिताश्व, जो वन में गया था और वहीं साँप के डसने से चल बसा था। एक-दूसरे को इस दशा में पहचानकर राजा और रानी का धैर्य टूट गया। दोनों बहुत देर तक विलाप करते रहे।

दुःख की उस घड़ी में दोनों ने निश्चय किया कि पुत्र के बिना वे भी नहीं जिएँगे; वे उसी चिता पर अपने प्राण त्याग देंगे। चिता सजाई गई, और राजा ने आँखें बंद कर भगवान नारायण का ध्यान किया।

तभी आकाश प्रकाश से भर गया। धर्मराज, इंद्र और सब देवता वहाँ प्रकट हुए, और उनके साथ महर्षि विश्वामित्र भी। धर्म ने कहा, “राजन, ऐसा मत करो। तुम्हारे सत्य, धैर्य और सहनशीलता से हम सब प्रसन्न हैं।”

इंद्र ने अमृत की वर्षा की, और रोहिताश्व ऐसे उठ बैठा मानो नींद से जागा हो। तब राजा को पता चला कि जिस चांडाल के वे सेवक बने थे, वह स्वयं धर्म थे, जो उनकी परीक्षा ले रहे थे।

इंद्र ने हरिश्चंद्र को पत्नी सहित स्वर्ग चलने का निमंत्रण दिया। पर राजा बोले, “मेरी प्रजा मेरे वियोग में दुखी रही है। उन्हें छोड़कर मैं अकेला स्वर्ग नहीं जाऊँगा।” राजा का यह प्रजा-प्रेम देखकर इंद्र ने बात मान ली, और अयोध्या के लोग भी अपने राजा के साथ स्वर्ग को गए।

रोहिताश्व का अयोध्या के सिंहासन पर अभिषेक हुआ, और राजवंश की परंपरा आगे चली।

हरिश्चंद्र ने राज्य खोया, परिवार से बिछड़े, राजा से श्मशान के सेवक बने, पर एक क्षण के लिए भी अपने वचन से नहीं डिगे। इसीलिए आज भी जो अपनी बात का पक्का हो, उसे सत्यवादी हरिश्चंद्र कहा जाता है।

इस कथा का संदेश

सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, पर अंत में वही मनुष्य को सबसे ऊँचा उठाता है।

यह पुनर्कथन मार्कण्डेय पुराण के वृत्तांत पर आधारित है। कुछ अन्य ग्रंथों और लोकप्रिय नाटकों में राजा का सपने में राज्य दान करना, और श्मशान का कर चुकाने के लिए शैव्या का अपनी साड़ी का आधा भाग फाड़कर देना जैसे प्रसंग आते हैं; ये बाद की परंपरा के हैं।

कथा पढ़ ली — अब अपनी कुंडली देखें

जन्म तिथि, समय और स्थान से मुफ़्त कुंडली, दशा और ग्रह स्थिति। AI ज्योतिषी से पहले 10 सवाल फ्री — कोई कार्ड नहीं चाहिए।

मुफ़्त कुंडली बनाएँ

आज का पंचांग देखें

आगे