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प्रह्लाद और नरसिंह
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, सप्तम स्कंध (अध्याय 3–10)
दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से वर पाया: न ब्रह्मा के रचे किसी प्राणी से मृत्यु हो, न घर के भीतर न बाहर, न दिन में न रात में, न धरती पर न आकाश में, न किसी अस्त्र-शस्त्र से, न मनुष्य से न पशु से।
वर पाकर वह स्वयं को अमर समझने लगा। तीनों लोक जीत लिए और भगवान विष्णु से बैर ठान लिया, क्योंकि विष्णु ने ही उसके भाई हिरण्याक्ष का वध किया था।
पर उसी के घर जन्मा प्रह्लाद, जिसका मन बचपन से ही भगवान में रमा था। एक दिन पिता ने प्यार से पूछा, “बेटा, तुमने गुरुकुल में सबसे अच्छी बात क्या सीखी?” प्रह्लाद बोला, “भगवान की कथा सुनना, उनका नाम लेना, उनका स्मरण और सेवा करना: यही सबसे श्रेष्ठ है।”
हिरण्यकशिपु क्रोध से काँप उठा। उसने बालक को मारने का आदेश दे दिया। दैत्यों ने त्रिशूलों से वार किया, पर वे बेकार गए। फिर उसे हाथियों से कुचलवाया गया, विषैले सर्पों से डँसवाया गया, विष दिया गया, ऊँचे पर्वत से नीचे फेंका गया, भूखा रखा गया। हर बार प्रह्लाद शांत मन से भगवान को याद करता रहा, और हर बार बच गया।
अंत में हिरण्यकशिपु ने सभा में गरजकर पूछा, “मूर्ख! किसके बल पर तू मेरी आज्ञा नहीं मानता?” प्रह्लाद ने विनम्रता से कहा, “पिताजी, जो सबका बल है, वही मेरा भी बल है।”
“कहाँ है तेरा भगवान? यदि वह सब जगह है, तो इस खंभे में क्यों नहीं दिखता?” प्रह्लाद बोला, “वे इसमें भी हैं।”
“तो आज मैं तेरा सिर काटता हूँ, देखता हूँ तेरा हरि तुझे कैसे बचाता है!” यह कहकर हिरण्यकशिपु सिंहासन से कूदा और पूरे बल से खंभे पर घूँसा मारा। उसी क्षण एक ऐसा भयंकर नाद हुआ कि पूरा ब्रह्मांड काँप उठा…
खंभा फटा, और उसमें से एक अद्भुत रूप प्रकट हुआ: न पूरा मनुष्य, न पूरा पशु। सिंह का मुख, मनुष्य का शरीर, जलती हुई आँखें और तीखे नख। यह थे भगवान नरसिंह।
हिरण्यकशिपु गदा लेकर उन पर टूट पड़ा। कुछ देर भगवान उससे खेलते-से लड़ते रहे। फिर संध्या के समय, जब न दिन था न रात, उन्होंने उसे पकड़ा और सभा-भवन की देहली पर ले गए, जो न घर के भीतर थी न बाहर।
वहाँ उन्होंने उसे अपनी जाँघों पर रखा, जो न धरती थी न आकाश, और अपने नखों से, जो न अस्त्र थे न शस्त्र, उसका अंत कर दिया। ब्रह्मा जी का एक-एक वर सच रहा, और फिर भी अधर्म नहीं बचा।
देवता स्तुति करने आए, पर भगवान का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। कोई पास जाने का साहस नहीं कर पाया, स्वयं लक्ष्मी जी भी नहीं। तब ब्रह्मा जी ने कहा, “प्रह्लाद, बेटा, तुम्हीं जाओ।”
बालक प्रह्लाद निर्भय होकर आगे बढ़ा और भगवान के चरणों में लेट गया। भगवान का हृदय पिघल गया। उन्होंने उसे उठाया और अपना कमल-सा हाथ उसके सिर पर रख दिया। प्रह्लाद ने प्रेम से उनकी स्तुति की, और नरसिंह भगवान शांत हो गए।
भगवान बोले, “वर माँगो।” प्रह्लाद ने कहा, “प्रभु, यदि देना ही है, तो यह दीजिए कि मेरे मन में कभी कोई कामना ही न उठे।” फिर हाथ जोड़कर बोला, “मेरे पिता ने आपकी बहुत निंदा की। उन्हें क्षमा कर दीजिए।”
भगवान मुस्कुराए, “तुम्हारे जैसे पुत्र के कारण तुम्हारे पिता ही नहीं, तुम्हारे कुल की इक्कीस पीढ़ियाँ पवित्र हो गईं।” उन्होंने प्रह्लाद को राजा बनाने का आदेश दिया और अंतर्धान हो गए।
इस कथा का संदेश
सच्ची भक्ति किसी भय से नहीं डिगती, और भगवान अपने भक्त के वचन को सच करने के लिए खंभे से भी प्रकट हो जाते हैं। प्रह्लाद ने बदले में कुछ नहीं माँगा, उलटे अपने सताने वाले के लिए क्षमा माँगी।
भगवान नरसिंह का प्राकट्य-दिवस नरसिंह जयंती वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। होलिका की गोद में प्रह्लाद को बिठाकर जलाने की प्रसिद्ध कथा भागवत में नहीं है; वह बाद की परंपरा से आती है, जिसकी स्मृति में होलिका दहन होता है।
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