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नरकासुर वध
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, दशम स्कंध (अध्याय 59)
प्राग्ज्योतिषपुर में भौमासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर राज करता था। वह पृथ्वी देवी (भूदेवी) का पुत्र था, इसलिए भौम कहलाता था, पर अपने कर्मों के कारण लोग उसे नरकासुर कहते थे।
उसका अहंकार इतना बढ़ गया था कि उसने वरुण देव का छत्र छीन लिया, देवमाता अदिति के कुंडल उतार लिए, और मंदराचल पर्वत पर देवताओं का स्थान मणिपर्वत भी अपने अधिकार में ले लिया।
यही नहीं, उसने अनेक राज्यों से राजकुमारियों का हरण करके उन्हें अपने महल में बंदी बना रखा था। उनकी संख्या सोलह हज़ार थी।
दुखी इंद्र द्वारका पहुँचे और भगवान श्रीकृष्ण को सारी व्यथा सुनाई। श्रीकृष्ण ने गरुड़ का स्मरण किया, और अपनी रानी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर की ओर उड़ चले।
नरकासुर का नगर अभेद्य था। उसके चारों ओर पहाड़ों की दीवार थी, शस्त्रों का घेरा था, जल, अग्नि और वायु के घेरे थे, और सबसे ऊपर मुर नाम के असुर के बिछाए हज़ारों मज़बूत पाश।
श्रीकृष्ण ने गदा से पहाड़ तोड़े, बाणों से शस्त्रों का घेरा काटा, सुदर्शन चक्र से जल-अग्नि-वायु के घेरे भेदे, और तलवार से मुर के पाश काट डाले। फिर उन्होंने पाञ्चजन्य शंख फूँका।
शंख की गर्जना सुनकर पाँच सिरों वाला मुर दैत्य जल से उठा और त्रिशूल लेकर दौड़ा। और उसके बाद… अपने विशाल हाथी पर सवार होकर स्वयं नरकासुर रणभूमि में उतरा।
श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से मुर दैत्य का अंत किया। फिर मुर के सात पुत्र पीठ के नेतृत्व में लड़ने आए, पर वे भी भगवान के बाणों के आगे टिक न सके।
तब नरकासुर अपनी हाथियों की सेना लेकर आया। उसने श्रीकृष्ण पर शक्ति अस्त्र चलाया, पर भगवान ने उसे बीच में ही काट दिया। गरुड़ ने भी अपने पंखों और चोंच से असुर सेना को तितर-बितर कर दिया।
अंत में, जब नरकासुर ने एक त्रिशूल उठाया, उसी क्षण श्रीकृष्ण ने अपने तीक्ष्ण धार वाले सुदर्शन चक्र से हाथी पर बैठे नरकासुर का सिर काट दिया। देवताओं ने आकाश से पुष्प बरसाए।
तभी स्वयं भूदेवी वहाँ आईं। वे अदिति के कुंडल, वैजयंती माला, वरुण का छत्र और मणि लेकर श्रीकृष्ण के सामने खड़ी हुईं और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगीं।
भूदेवी ने विनती की, “प्रभु, यह नरकासुर का पुत्र भगदत्त भयभीत है। इसे अभय दीजिए।” श्रीकृष्ण ने भगदत्त को अभय दिया और उसे राज्य सौंप दिया।
फिर श्रीकृष्ण नरकासुर के महल में गए, जहाँ सोलह हज़ार राजकुमारियाँ बंदी थीं। भागवत बताता है कि उन सबने भगवान को देखते ही मन ही मन उन्हें अपना पति मान लिया। श्रीकृष्ण ने उन्हें मुक्त किया, सम्मान से पालकियों में बैठाकर द्वारका भेजा, और बाद में उन सबसे विधिपूर्वक विवाह कर उन्हें सम्मान का स्थान दिया।
इसके बाद श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ स्वर्ग गए और देवमाता अदिति को उनके कुंडल लौटा दिए। देवताओं ने भगवान का अभिनंदन किया।
परंपरा के अनुसार यह विजय कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुई थी। इसी की स्मृति में यह दिन नरक चतुर्दशी कहलाता है, और लोग इस दिन भोर में स्नान कर दीपक जलाते हैं, मानो अंधकार और अत्याचार पर प्रकाश की जीत का उत्सव मना रहे हों।
इस कथा का संदेश
अहंकार कितना भी बड़ा हो, धर्म के आगे टिकता नहीं। और ईश्वर की करुणा पराजित के परिवार और पीड़ितों, दोनों तक पहुँचती है।
नरक चतुर्दशी (रूप चौदस, छोटी दीपावली) पर भोर में उबटन और तेल लगाकर स्नान (अभ्यंग स्नान) करने और संध्या को दीपक जलाने की परंपरा है। भागवत में श्रीकृष्ण ही नरकासुर का वध करते हैं और सत्यभामा उनके साथ रहती हैं; कुछ अन्य परंपराओं और दक्षिण भारत की लोक कथाओं में सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध का वर्णन मिलता है। नरक चतुर्दशी से इस कथा का तिथि-संबंध परंपरा से है।
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