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नल और दमयंती
स्रोत: महाभारत, वन पर्व (नलोपाख्यान पर्व)
निषध देश के राजा नल रूप, गुण और अश्व-विद्या में अद्वितीय थे। विदर्भ के राजा भीम की पुत्री दमयंती भी वैसी ही गुणवती थीं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा तक नहीं था, फिर भी गुण सुन-सुनकर मन ही मन प्रेम करने लगे थे।
एक दिन नल ने उपवन में एक सुनहरा हंस पकड़ा। हंस बोला, “मुझे छोड़ दो, मैं दमयंती के पास जाकर तुम्हारे गुण ऐसे गाऊँगा कि वह तुम्हारे सिवा किसी को न चाहे।” और उसने वैसा ही किया।
दमयंती का स्वयंवर हुआ। रास्ते में नल को चार देवता मिले: इंद्र, अग्नि, वरुण और यम। वे भी दमयंती से विवाह चाहते थे, और नल से अपना दूत बनने को कहा। वचन दे चुके नल ने मन पर पत्थर रखकर देवताओं का संदेश दमयंती को ईमानदारी से सुना दिया।
स्वयंवर में दमयंती ने देखा कि नल के रूप में पाँच एक जैसे पुरुष बैठे हैं। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवताओं ने अपने चिह्न प्रकट कर दिए: न पसीना, न पलक झपकना, न मुरझाई माला, और पैर धरती से ऊपर। दमयंती ने असली नल को वरमाला पहना दी।
पर कलि देर से पहुँचा। नल के चुने जाने से क्रोधित होकर वह बारह वर्ष तक नल में कोई चूक ढूँढ़ता रहा। एक दिन संध्या-वंदन से पहले नल पैर धोना भूल गए, और कलि उनमें प्रवेश कर गया।
कलि के प्रभाव में नल अपने भाई पुष्कर से जुए में राज्य, धन, सब हार गए। दमयंती ने बच्चों को पिता के घर भेजा और पति के साथ वन चल पड़ीं। वहाँ नल का वस्त्र भी पक्षी उड़ा ले गए, तो दोनों एक ही वस्त्र में रहने लगे।
एक रात थकी हुई दमयंती सो रही थीं। कलि से भ्रमित नल ने उस वस्त्र का आधा भाग काटा… और सोती हुई पत्नी को अकेले वन में छोड़कर चले गए।
दमयंती जागीं तो विलाप करती हुई वन में भटकने लगीं। एक अजगर ने उन्हें जकड़ लिया, तो एक शिकारी ने बचाया, पर फिर उसी की नीयत बिगड़ गई, और दमयंती के शाप से वह वहीं गिर पड़ा। भटकते-भटकते वे व्यापारियों के एक दल के साथ चेदि राज्य पहुँचीं और वहाँ की राजमाता के पास सैरंध्री बनकर रहने लगीं।
उधर नल ने वन की आग में फँसे नाग कर्कोटक को बचाया। कर्कोटक ने उन्हें डस लिया, जिससे उनका रूप बदल गया। नाग ने कहा, “इस रूप में तुम्हें कोई नहीं पहचानेगा, और मेरा विष तुम्हारे भीतर बैठे कलि को जलाता रहेगा।” उसने नल को दिव्य वस्त्र भी दिए, जिन्हें ओढ़ते ही उनका असली रूप लौट आता।
नल बाहुक नाम से अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के सारथी बन गए। रात को अकेले में एक श्लोक कहकर वे अपनी खोई पत्नी को याद करते।
इधर सुदेव नाम के ब्राह्मण ने दमयंती को पहचान लिया और वे विदर्भ लौट आईं। उन्होंने ब्राह्मणों को देश-देश भेजा, एक प्रश्न के साथ: “हे जुआरी, आधा वस्त्र काटकर अपनी प्रिया को वन में छोड़ तुम कहाँ चले गए?” अयोध्या में बाहुक ने उसका उत्तर दिया, और दमयंती समझ गईं।
तब उन्होंने एक युक्ति की। ऋतुपर्ण को संदेश भेजा गया कि कल ही दमयंती का दूसरा स्वयंवर है। इतनी दूरी एक दिन में केवल नल ही तय कर सकते थे। बाहुक ने ऐसा रथ हाँका कि ऋतुपर्ण दंग रह गए। रास्ते में ऋतुपर्ण ने उन्हें पासों की विद्या सिखाई, और उसी क्षण कलि नल के शरीर से निकल गया।
विदर्भ में दमयंती ने अपनी दासी केशिनी से बाहुक की परीक्षा करवाई। उनके देखते ही घड़े जल से भर जाते, घास छूते ही आग पकड़ लेती। और जब बाहुक अपने ही बच्चों को गले लगाकर रो पड़े, तो कोई संदेह न रहा।
आमने-सामने आकर दमयंती ने अपनी पवित्रता की शपथ ली, और आकाश से वायुदेव ने उसकी साक्षी दी। नल ने कर्कोटक का वस्त्र ओढ़ा और अपने असली रूप में लौट आए। बिछड़े हुए पति-पत्नी फिर मिल गए।
नल ने पुष्कर को फिर जुए की चुनौती दी, और इस बार पासों की विद्या से अपना राज्य वापस जीत लिया। फिर भी उन्होंने पुष्कर को क्षमा किया और प्रेम से विदा किया।
इस कथा का संदेश
विपत्ति प्रेम की परीक्षा लेती है, पर धैर्य, बुद्धि और निष्ठा से बिछड़े रिश्ते भी फिर जुड़ जाते हैं।
महाभारत में यह कथा ऋषि बृहदश्व ने वनवास में दुखी युधिष्ठिर को सुनाई थी। कथा में कलि स्वयं वचन देता है कि जो लोग नल की यह कथा कहेंगे-सुनेंगे, उन्हें कलि का भय नहीं रहेगा।
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