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नचिकेता और यमराज

स्रोत: कठोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद), प्रथम अध्याय, वल्ली 1–3

वाजश्रवस नाम के एक ऋषि ने एक बड़ा यज्ञ किया, जिसमें अपना सब कुछ दान कर देना होता है। पर दान में जो गायें दी जा रही थीं, वे बूढ़ी थीं: जो पानी पी चुकी थीं, घास खा चुकी थीं, जिनका दूध सूख चुका था।

ऋषि का पुत्र नचिकेता अभी बालक ही था, पर उसके मन में गहरी श्रद्धा थी। उसने सोचा, “ऐसे दान से पिता को पुण्य नहीं, दुख ही मिलेगा।”

वह पिता के पास गया और बोला, “पिताजी, आप मुझे किसे दान देंगे?” पिता चुप रहे। उसने दूसरी बार पूछा, फिर तीसरी बार। झुँझलाकर पिता के मुँह से निकला, “तुम्हें मैं मृत्यु को देता हूँ!”

नचिकेता ने पिता के वचन को सत्य माना। उसने कहा, “मनुष्य अनाज की तरह पकता है और अनाज की तरह फिर उगता है। पिता का वचन झूठा न हो।” और वह यमराज के लोक को चल पड़ा।

यमराज उस समय घर पर नहीं थे। नचिकेता तीन रात उनके द्वार पर बिना अन्न-जल के प्रतीक्षा करता रहा।

यमराज लौटे तो बहुत लज्जित हुए: अतिथि ब्राह्मण तीन रात भूखा रहा! उन्होंने कहा, “तुम्हारे तीन रातों के लिए मुझसे तीन वर माँग लो।”

पहला वर नचिकेता ने माँगा, “मेरे पिता का क्रोध शांत हो, और जब मैं लौटूँ तो वे मुझे पहचानकर प्रेम से मिलें।” यमराज ने कहा, “तथास्तु।” दूसरा वर: स्वर्ग दिलाने वाली अग्नि-विद्या। यमराज ने वह भी सिखा दी, और प्रसन्न होकर उस अग्नि का नाम ही नाचिकेत अग्नि रख दिया।

अब तीसरा वर। नचिकेता ने यमराज की आँखों में देखकर पूछा, “मनुष्य के मरने पर कुछ कहते हैं वह रहता है, कुछ कहते हैं नहीं रहता। मुझे यह रहस्य बताइए।”

यमराज गंभीर हो गए। “नचिकेता, इस विषय में तो देवताओं को भी संदेह रहा है। यह बहुत सूक्ष्म है। कोई और वर माँग लो, यह प्रश्न छोड़ दो।”

नचिकेता बोला, “यदि देवता भी नहीं जानते और आप कहते हैं यह कठिन है, तो आप जैसा बताने वाला मुझे और कहाँ मिलेगा? इसके बराबर कोई दूसरा वर नहीं।”

तब यमराज ने उसे परखा। “सौ वर्ष जीने वाले पुत्र-पौत्र माँग लो, गायें, हाथी, घोड़े, सोना माँग लो। विशाल धरती का राज्य माँग लो, जितने वर्ष चाहो जियो। रथों और वाद्यों के साथ ऐसी सुंदर अप्सराएँ ले लो जो मनुष्यों को दुर्लभ हैं। बस मृत्यु के बारे में मत पूछो।”

नचिकेता ने शांति से उत्तर दिया, “ये सब कल तक ही हैं, और इंद्रियों का तेज भी घिस देते हैं। जीवन वैसे भी छोटा है। आपके घोड़े, नाच-गाने आपके ही रहें। मनुष्य धन से कभी तृप्त नहीं होता। मुझे तो वही वर चाहिए।”

यमराज प्रसन्न हो उठे। “नचिकेता, मनुष्य के सामने दो रास्ते आते हैं: श्रेय, जो कल्याण करता है, और प्रेय, जो केवल अच्छा लगता है। बुद्धिमान श्रेय चुनता है। तुमने सारे सुख परखकर छोड़ दिए। तुम जैसा जिज्ञासु मुझे मिले।”

फिर यमराज ने उपदेश दिया: “आत्मा न जन्म लेता है, न मरता है। शरीर मारा जाता है, आत्मा नहीं मरता। यह शरीर एक रथ है, आत्मा उसका स्वामी, बुद्धि सारथी, मन लगाम और इंद्रियाँ घोड़े हैं। जिसकी लगाम सधी है, वही लक्ष्य तक पहुँचता है।”

उपनिषद का यही स्वर आगे गूँजता है: “उठो, जागो, और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो।”

उपनिषद कहता है कि यमराज से यह विद्या पाकर नचिकेता विकारों और मृत्यु से मुक्त हो गया, और जो भी आत्मा को इस प्रकार जान लेता है, वह भी मुक्त हो जाता है।

इस कथा का संदेश

जीवन में बार-बार श्रेय और प्रेय के बीच चुनना पड़ता है। नचिकेता ने सिखाया कि जो सच में कल्याण करे, उसके लिए हर लुभावना सुख छोड़ा जा सकता है।

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