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मार्कंडेय और महामृत्युंजय
स्रोत: पुराणों में वर्णित और शैव परंपरा में प्रचलित कालांतक शिव की कथा; महामृत्युंजय मंत्र: ऋग्वेद, मंडल 7, सूक्त 59, मंत्र 12
महर्षि मृकंडु और उनकी पत्नी धर्मपरायण थे, पर उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान की कामना से उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले, “मैं तुम्हें पुत्र दूँगा। पर चुनो: एक ऐसा पुत्र जो लंबी आयु पाए पर गुणहीन हो, या ऐसा पुत्र जो ज्ञानी, गुणवान और मेरा भक्त हो, पर जिसकी आयु केवल सोलह वर्ष हो।”
माता-पिता के मन में एक पल को द्वंद्व हुआ। फिर मृकंडु ने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, हमें गुणवान पुत्र दीजिए, चाहे उसकी आयु छोटी ही क्यों न हो।” शिव ने कहा, “तथास्तु।”
समय पर पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया मार्कंडेय। बालक अद्भुत था। छोटी आयु में ही उसने वेद-शास्त्र पढ़ लिए, और उसका मन सदा शिव की भक्ति में लगा रहता।
पर माता-पिता के मन में एक पीड़ा छिपी रहती थी। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता, वे दिन गिनते। जब सोलहवाँ वर्ष आया, तो उनकी आँखों से आँसू रुकते नहीं थे।
मार्कंडेय ने कारण पूछा, और माता-पिता ने सारी बात बता दी। बालक घबराया नहीं। उसने कहा, “आप चिंता न करें। जिन शिव ने मुझे दिया, उन्हीं की शरण में जाऊँगा।” वह शिवलिंग के सामने बैठकर पूरी निष्ठा से शिव की आराधना करने लगा।
नियत दिन आया। यमदूत आए, पर बालक की भक्ति के तेज के आगे पास न जा सके। तब स्वयं यमराज अपने भैंसे पर सवार होकर आए। उन्होंने अपना पाश घुमाया और मार्कंडेय की ओर फेंका। बालक ने दौड़कर दोनों हाथों से शिवलिंग को कसकर पकड़ लिया, और पाश बालक के साथ शिवलिंग पर भी जा गिरा…
जैसे ही पाश शिवलिंग पर पड़ा, लिंग फट गया, और उसमें से स्वयं भगवान शिव प्रचंड रूप में प्रकट हुए। अपने भक्त पर मृत्यु का हाथ उठते देख उनका क्रोध भड़क उठा।
शिव ने यमराज पर प्रहार किया, और मृत्यु के देवता धरती पर गिर पड़े। उसी दिन से शिव का एक नाम पड़ा कालांतक, यानी काल का भी अंत करने वाले, और मृत्युंजय, यानी मृत्यु को जीतने वाले।
शिव ने मार्कंडेय को आशीर्वाद दिया कि वह सदा सोलह वर्ष का रहेगा और चिरंजीवी होगा। मार्कंडेय उन चिरंजीवियों में गिने जाते हैं जो युगों-युगों तक जीवित रहते हैं।
परंपरा बताती है कि बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने यमराज को फिर से जीवित किया, क्योंकि सृष्टि का संतुलन मृत्यु के बिना नहीं चल सकता। पर यह नियम बन गया कि शिव के सच्चे भक्त पर यम का अधिकार नहीं चलता।
यही मार्कंडेय आगे चलकर महान ऋषि बने। मार्कण्डेय पुराण, जिसमें दुर्गा सप्तशती भी है, उन्हीं के नाम से जुड़ा है।
लोक परंपरा मार्कंडेय को महामृत्युंजय मंत्र से जोड़ती है: “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥” यह मंत्र मूल रूप से ऋग्वेद में है। इसका भाव है: हम तीन नेत्रों वाले शिव की उपासना करते हैं, जो सुगंध से भरे हैं और पोषण बढ़ाते हैं। जैसे पका हुआ ककड़ी का फल बेल से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमृत से नहीं।
तमिलनाडु के तिरुक्कडैयूर में शिव के कालसंहार रूप का प्रसिद्ध मंदिर है, जहाँ यह कथा आज भी श्रद्धा से याद की जाती है।
इस कथा का संदेश
भय से बड़ी है भक्ति। जो पूरे मन से शिव की शरण में जाता है, उसके लिए मृत्यु का भय भी छोटा हो जाता है।
मासिक शिवरात्रि, सोमवार और श्रावण मास में महामृत्युंजय मंत्र का जप विशेष रूप से किया जाता है। मार्कंडेय को इस मंत्र से जोड़ना लोक परंपरा है; मंत्र स्वयं ऋग्वेद का है। यह प्रसंग अलग-अलग पुराणों में कुछ भिन्न विवरणों के साथ मिलता है।
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