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महिषासुर मर्दिनी
स्रोत: मार्कण्डेय पुराण, देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय 2–4
बहुत पहले देवताओं और असुरों के बीच सौ वर्षों तक भीषण युद्ध चला। देवताओं के स्वामी इंद्र थे, और असुरों का राजा था महिषासुर। अंत में देवता हार गए, और महिषासुर स्वयं इंद्र बनकर स्वर्ग पर बैठ गया।
हारे हुए देवता ब्रह्मा को आगे करके वहाँ पहुँचे जहाँ भगवान विष्णु और शिव विराजमान थे। उन्होंने सारी कथा सुनाई: “महिषासुर ने सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, वायु, सबके अधिकार छीन लिए हैं। हम स्वर्ग से निकाले गए हैं और धरती पर भटक रहे हैं।”
यह सुनकर विष्णु और शिव क्रोध से भर उठे, उनकी भौंहें तन गईं। उस क्रोध से उनके मुख से महान तेज निकला। फिर ब्रह्मा, इंद्र और सभी देवताओं के शरीर से भी तेज निकला, और सारा तेज एक जगह मिल गया।
वह तेज-पुंज जलते हुए पर्वत जैसा दिखता था, जिसकी ज्वालाएँ सारी दिशाओं में फैल रही थीं। और उस अद्भुत तेज से एक नारी का रूप प्रकट हुआ, जिसकी कांति से तीनों लोक जगमगा उठे।
शिव के तेज से उनका मुख बना, यम के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएँ। हर देवता के तेज से देवी का कोई न कोई अंग बना।
फिर देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र दिए। शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष और बाण, इंद्र ने वज्र और ऐरावत का घंटा। हिमवान ने सवारी के लिए सिंह दिया।
सब अस्त्रों से सजी देवी ने ऊँचे स्वर में अट्टहास किया। उस गर्जना से आकाश गूँज उठा, धरती काँप गई, समुद्र उछल पड़े और पर्वत हिल गए। महिषासुर ने वह गर्जना सुनी, और अपनी विशाल सेना के साथ उस ओर दौड़ पड़ा…
महिषासुर के सेनापति चिक्षुर, चामर, उदग्र और अनेक महा असुर अपनी सेनाओं के साथ देवी पर टूट पड़े। देवी ने खेल-खेल में उनके अस्त्र काट डाले। उनकी साँसों से सैकड़ों-हज़ारों गण प्रकट हुए, जो असुरों से लड़ने लगे। देवी का सिंह भी असुरों पर झपटता रहा।
एक-एक करके महिषासुर के सारे सेनापति मारे गए। तब महिषासुर स्वयं भैंसे के रूप में आया। उसने अपने खुरों से धरती रौंद दी, सींगों से पर्वत उछाले, और पूँछ के प्रहार से समुद्र उफन पड़ा।
देवी ने उस पर पाश फेंका और उसे बाँध लिया। तब उसने भैंसे का रूप छोड़ दिया और सिंह बन गया। देवी ने उसका सिर काटना चाहा, तो वह तलवार लिए एक पुरुष बन गया। देवी ने बाणों से उसे बींधा, तो वह विशाल हाथी बन गया और अपनी सूँड़ से देवी के सिंह को खींचने लगा। देवी ने तलवार से सूँड़ काट दी, और वह फिर भैंसा बन गया।
क्रोध में भरी देवी ने दिव्य पेय का पान किया और हँसकर बोलीं, “गरज ले मूर्ख, गरज ले, जब तक मैं यह पान कर रही हूँ। मेरे हाथों तेरा अंत होते ही देवता यहीं आनंद से गरजेंगे।”
फिर देवी उछलीं, उस महा असुर पर चढ़ गईं, अपने पैर से उसकी गर्दन दबाई और त्रिशूल से उस पर प्रहार किया। महिषासुर अपने ही भैंसे के मुख से आधा बाहर निकल आया, और देवी ने अपनी महान तलवार से उसका सिर काट गिराया।
असुर सेना हाहाकार करती हुई भाग गई। आकाश से फूल बरसे, गंधर्व गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं।
इंद्र सहित सभी देवताओं ने सिर झुकाकर देवी की स्तुति की। देवी प्रसन्न हुईं और बोलीं, “वर माँगो।” देवताओं ने कहा, “माँ, आपने सब कुछ दे दिया। बस इतना कीजिए कि जब भी हम संकट में आपको याद करें, आप हमारी रक्षा के लिए आ जाएँ।”
देवी ने कहा, “तथास्तु,” और अंतर्धान हो गईं। तभी से वे महिषासुर मर्दिनी कहलाती हैं, महिषासुर का मर्दन करने वाली।
इस कथा का संदेश
जब सब शक्तियाँ एक हो जाती हैं, तब बड़े से बड़ा अहंकार भी टिक नहीं पाता। देवी का वचन है कि सच्चे मन से याद करने पर वे संकट में रक्षा करती हैं।
नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ होता है, जिसका मध्यम चरित्र यही कथा है। महिषासुर पर देवी की विजय का उत्सव विजयादशमी के साथ भी जुड़ा है।
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