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शरद पूर्णिमा: कोजागरी लक्ष्मी कथा

स्रोत: कोजागरी (कोजागर) व्रत की पारंपरिक व्रत कथा, लोक-प्रचलित

कोजागरी व्रत की पारंपरिक कथा के अनुसार, मगध देश में वलित नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह विद्वान और सदाचारी था, पर बहुत गरीब था।

उसकी पत्नी का नाम चंडी था। वह स्वभाव से झगड़ालू थी और पति की हर बात का उल्टा करती थी। वलित जो कहता, चंडी ठीक उसका विपरीत करती। घर में कभी शांति नहीं रहती थी।

हारकर वलित ने एक उपाय निकाला। जो काम करवाना होता, वह उसका उल्टा कहता। “आज भोजन मत बनाना,” कहता, तो चंडी भोजन बना देती। इस तरह किसी तरह घर चलता रहा।

फिर वलित के पिता के श्राद्ध का दिन आया। सब काम उल्टा कहकर ठीक-ठीक हो गए। पर अंत में वलित भूल गया और सीधे कह बैठा, “अब पिंड को पवित्र जल में प्रवाहित कर दो।”

चंडी ने हमेशा की तरह उल्टा किया, और पिंड को एक अपवित्र स्थान पर फेंक दिया। पिता का श्राद्ध भी अपमानित हो गया। वलित का हृदय टूट गया।

दुख से भरा वलित घर छोड़कर निकल पड़ा। चलते-चलते वह घने वन में पहुँच गया। उस दिन आश्विन मास की पूर्णिमा थी। आकाश में पूरा चंद्रमा चमक रहा था, और चाँदनी में सारा वन दूध जैसा उजला दिख रहा था।

तभी उसे पास से हँसी और बातों की आवाज़ सुनाई दी। आगे बढ़कर उसने देखा कि कुछ दिव्य कन्याएँ चाँदनी में बैठी हैं, और उनके सामने चौसर बिछी है। एक ने उसे देखकर पुकारा, “ब्राह्मण देवता, आज की रात सोना मत…”

वे नाग कन्याएँ थीं। उन्होंने बताया कि आज कोजागरी पूर्णिमा है। इस रात वे व्रत रखकर पूरी रात जागती हैं। उन्होंने वलित को अपने साथ चौसर खेलने के लिए बुलाया।

वलित उनके साथ बैठ गया। खेल शुरू हुआ, और रात बीतने लगी। वलित एक के बाद एक बाज़ी जीतता गया। उसका मन, जो कुछ घड़ी पहले दुख में डूबा था, अब जागरण के आनंद में लगा था।

आधी रात हुई। कथा कहती है कि उसी समय देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हुई वहाँ से गुज़रीं। वे हर ओर देखकर पूछ रही थीं: “को जागर्ति?” यानी, “कौन जाग रहा है?”

उन्होंने देखा कि वलित इस पवित्र रात में जाग रहा है। देवी प्रसन्न हुईं और उन्होंने उस पर अपनी कृपा बरसाई। जो ब्राह्मण घर से खाली हाथ निकला था, उसे अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई।

सुबह होने पर वलित धन के साथ घर लौटा। लक्ष्मी की कृपा से उसकी दरिद्रता दूर हो गई, और वह सुख से जीवन बिताने लगा।

इसी कारण इस रात को कोजागरी कहते हैं, “को जागर्ति” से। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी घर-घर जाकर देखती हैं कि कौन जागकर उनका स्मरण कर रहा है, और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

कथा का भाव केवल धन नहीं है। वलित ने दुख में भी धर्म नहीं छोड़ा, और जब भाग्य ने अवसर दिया, तो वह जागता रहा। जागना यानी सजग रहना: आलस्य और निराशा में सो न जाना।

ध्यान रहे, इस कथा के रूप अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ भिन्न मिलते हैं। कहीं इसे राजा-रानी की कथा के रूप में सुनाया जाता है, कहीं ब्राह्मण की। सबका सार एक है: इस रात जागरण और लक्ष्मी की उपासना।

इस कथा का संदेश

जो जागता है, वही पाता है। लक्ष्मी उसी के घर आती हैं जो सजग, धैर्यवान और धर्म पर टिका रहता है।

आश्विन पूर्णिमा, यानी शरद पूर्णिमा की रात कोजागरी व्रत रखा जाता है। इस रात लक्ष्मी पूजा और रात्रि जागरण होता है, और कई घरों में खीर बनाकर चाँदनी में रखी जाती है और अगली सुबह प्रसाद के रूप में ली जाती है। बंगाल, ओडिशा और मिथिला में यह कोजागरी लक्ष्मी पूजा के रूप में बड़े उत्साह से मनाई जाती है।

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