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कर्ण का जन्म और कवच-कुंडल का दान
स्रोत: महाभारत, आदि पर्व (संभव पर्व) और वन पर्व (कुंडलाहरण पर्व)
राजा कुंतिभोज की पालिता पुत्री थीं पृथा, जिन्हें हम कुंती के नाम से जानते हैं। एक बार उनके यहाँ ऋषि दुर्वासा अतिथि बनकर आए। कुंती ने पूरे मन से उनकी सेवा की, और प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उन्हें एक मंत्र दिया: “इससे तुम जिस देवता का आवाहन करोगी, उसकी कृपा से तुम्हें पुत्र होगा।”
कौतूहल में किशोरी कुंती ने एक दिन उगते सूर्य को देखकर मंत्र पढ़ा, और सचमुच सूर्यदेव सामने प्रकट हो गए। कुंती घबरा गईं, पर देव का आवाहन व्यर्थ नहीं जा सकता था। सूर्य ने आश्वासन दिया कि उनका कौमार्य अक्षुण्ण रहेगा।
कुंती को एक तेजस्वी पुत्र हुआ, जो जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल धारण किए था। पर लोकलाज से डरी कुंती ने रोते हुए शिशु को एक पेटी में रखा और नदी में बहा दिया।
वह पेटी अधिरथ नाम के सारथी और उनकी पत्नी राधा को मिली। निःसंतान दंपती ने उसे अपना पुत्र मानकर पाला और नाम रखा वसुषेण। यही बालक आगे चलकर कर्ण कहलाया: महान धनुर्धर, और ऐसा दानी कि उसके द्वार से कोई ब्राह्मण खाली नहीं लौटता था।
वर्षों बाद, पांडवों के वनवास के दिनों में, सूर्यदेव ने स्वप्न में कर्ण को चेताया: “पुत्र, अर्जुन के हित के लिए इंद्र ब्राह्मण का वेश धरकर तुमसे कवच-कुंडल माँगने आएँगे। जब तक ये तुम्हारे पास हैं, तुम्हें कोई नहीं मार सकता। इन्हें मत देना।”
कर्ण ने विनम्र पर दृढ़ स्वर में कहा, “ब्राह्मण माँगे और मैं न दूँ, यह मुझसे नहीं होगा। मुझे प्राणों से अधिक अपना यश प्रिय है।”
और फिर एक दोपहर, जब कर्ण सूर्य की उपासना करके उठा, एक ब्राह्मण उसके सामने आ खड़ा हुआ: “मुझे भिक्षा में अपना कवच और कुंडल दे दो।”
कर्ण ने पहचान लिया कि यह कौन है। फिर भी उसने आदर से कहा, “ब्राह्मण देव, मैं आपको भूमि, गायें, धन, जो चाहें दे सकता हूँ। पर ये कवच-कुंडल मेरे शरीर के साथ जन्मे हैं; इन्हीं के कारण मैं अवध्य हूँ।” पर ब्राह्मण ने कुछ और लेने से इनकार कर दिया।
तब कर्ण मुस्कुराया: “देवराज, मैं आपको पहचानता हूँ। आप तो स्वयं वर देने वाले हैं। आप माँगें और बदले में कुछ न दें, यह उचित नहीं। फिर भी मैं मना नहीं करूँगा। बस बदले में मुझे अपनी अमोघ शक्ति दे दीजिए।” सूर्यदेव ने स्वप्न में यही सलाह दी थी।
इंद्र ने शर्त के साथ शक्ति दी: “इसका प्रयोग तुम केवल एक बार कर सकोगे। यह एक शत्रु को अवश्य मारकर मेरे पास लौट आएगी। पर दूसरे अस्त्र रहते या बिना प्राण-संकट के इसे चलाया, तो यह तुम्हीं पर गिरेगी। और जिसे तुम मारना चाहते हो, उसकी रक्षा स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं।”
कर्ण ने एक प्रार्थना और की: “मेरा शरीर कुरूप न हो।” इंद्र ने वह भी स्वीकार कर लिया।
फिर कर्ण ने तीखे शस्त्र से अपने शरीर से जुड़ा कवच उधेड़ना शुरू किया। देवता और मनुष्य देखते रह गए, पर उसके मुख पर पीड़ा की एक रेखा तक नहीं आई। रक्त से भीगा कवच और कानों से काटे कुंडल उसने इंद्र के हाथों में रख दिए। आकाश से फूल बरसे, और इंद्र मुस्कुराते हुए स्वर्ग लौट गए।
अपने शरीर को काटकर कवच उतारने के कारण कर्ण का एक नाम वैकर्तन भी पड़ा।
वह अमोघ शक्ति कर्ण ने अर्जुन के लिए सँभाल रखी थी। पर कुरुक्षेत्र के युद्ध में घटोत्कच के भीषण प्रहारों से कौरव सेना को बचाने के लिए उसे वह शक्ति घटोत्कच पर चलानी पड़ी।
कर्ण जानता था कि यह दान उसकी मृत्यु का द्वार खोल सकता है। फिर भी उसने प्राणों से अधिक अपने वचन और यश को मूल्य दिया। इसीलिए आज भी जब किसी महादानी का नाम लिया जाता है, तो सबसे पहले दानवीर कर्ण याद आता है।
इस कथा का संदेश
सच्चा दानी परिणाम जानकर भी अपना वचन नहीं तोड़ता। कर्ण के लिए वचन और यश प्राणों से भी बढ़कर थे।
कर्ण की जन्म कथा आदि पर्व में संक्षेप में और वन पर्व में विस्तार से आती है; वन पर्व के अनुसार कुंती ने पेटी अश्व नदी में बहाई थी। अमोघ शक्ति के घटोत्कच पर प्रयोग का प्रसंग द्रोण पर्व में है।
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