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कालिया मर्दन
स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध (अध्याय 15–17)
वृंदावन के पास यमुना में एक गहरा कुंड था। उसमें कालिय नाम का एक विशाल नाग अपने परिवार के साथ रहता था। उसके विष से कुंड का पानी खौलता रहता था। ऊपर से उड़ते पक्षी भी उसकी विषैली भाप से गिर पड़ते थे, और किनारे के पेड़-पौधे सूख गए थे।
एक दिन गर्मी में प्यासे ग्वालबालों और गायों ने अनजाने में उसी कुंड का पानी पी लिया, और सब निष्प्राण होकर किनारे गिर पड़े। श्रीकृष्ण ने अपनी अमृत भरी दृष्टि से उन्हें फिर जीवित कर दिया।
पर कृष्ण जानते थे कि जब तक कालिय वहाँ है, यमुना का जल विष ही रहेगा। उन्होंने निश्चय किया कि इस नाग को यहाँ से हटाना होगा।
वे किनारे के एक ऊँचे कदंब के पेड़ पर चढ़े, कमर कसी, भुजाएँ ठोकीं और विषैले जल में कूद पड़े। कुंड का पानी उछलकर सौ धनुष दूर तक जा गिरा।
हलचल सुनकर कालिय क्रोध से फुफकारता हुआ बाहर आया। उसने देखा, एक साँवला, कोमल बालक, पीतांबर पहने, निर्भय होकर जल में खेल रहा है। कालिय ने उनके मर्मस्थानों पर डँसा और अपनी कुंडलियों में उन्हें कसकर जकड़ लिया।
किनारे पर ग्वालबाल यह देखकर मूर्छित हो गए। गायें रंभाने लगीं। नंद बाबा, यशोदा मैया और सारे व्रजवासी रोते हुए दौड़े आए। यशोदा तो कुंड में कूदने को तैयार थीं। केवल बलराम शांत थे; वे अपने भाई का प्रभाव जानते थे, और उन्होंने सबको रोके रखा।
और जल में, नाग की कुंडलियों में बँधे, कृष्ण निश्चेष्ट दिखाई दे रहे थे…
कृष्ण ने देखा कि उनके कारण व्रज के लोग, जिनका उनके सिवा कोई सहारा नहीं, प्राण छोड़ने को तैयार हैं। कुछ क्षण वे साधारण बालक की तरह बंधन में रहे, फिर अपना शरीर फैलाने लगे। कुंडलियाँ ढीली पड़ीं, और कालिय को उन्हें छोड़ना पड़ा।
फुफकारता कालिय फन उठाकर उन पर झपटने का मौका ढूँढता रहा, और कृष्ण उसके चारों ओर ऐसे घूमते रहे जैसे गरुड़ साँप से खेलता है। जब वह थक गया, तो कृष्ण उछलकर उसके ऊँचे फनों पर चढ़ गए।
और वहीं, नाग के फनों पर, श्रीकृष्ण नृत्य करने लगे। देवता फूल बरसाने लगे, गंधर्व गाने लगे, मृदंग बजने लगे। कालिय का जो भी फन ऊपर उठता, कृष्ण उसे अपने चरणों से दबा देते। उसके मुँह से रक्त बहने लगा, और उसका सारा अहंकार चूर हो गया।
तब कालिय की पत्नियाँ, नागपत्नियाँ, कृष्ण की शरण में आईं। उन्होंने हाथ जोड़कर स्तुति की: “प्रभु, आपका यह दंड भी कृपा ही है, इससे इसके पाप धुल गए। पर इसके प्राण अब जाने ही वाले हैं। हम पर दया करके हमारे पति को प्राणदान दीजिए।”
कृष्ण ने प्रसन्न होकर कालिय को छोड़ दिया। होश में आकर कालिय ने भी हाथ जोड़े: “प्रभु, हम नाग जन्म से ही क्रोधी हैं। अब आप जो आज्ञा दें, वही करूँगा।”
कृष्ण ने कहा, “तुम अपने परिवार के साथ यह कुंड छोड़कर समुद्र में रमणक द्वीप चले जाओ, ताकि गायें और लोग यमुना का जल पी सकें। तुम्हारे फनों पर मेरे चरणों के चिह्न हैं; उन्हें देखकर गरुड़ तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे।”
कालिय यहाँ क्यों रहता था? भागवत बताती है: गरुड़ से बचने के लिए। सौभरि ऋषि के शाप के कारण गरुड़ इस कुंड में नहीं आ सकते थे, इसलिए यह गरुड़ से डरे कालिय का आश्रय बन गया था।
कालिय ने परिवार सहित कृष्ण की पूजा की और रमणक द्वीप चला गया। उस दिन से यमुना का जल फिर निर्मल हो गया। कृष्ण कुंड से बाहर आए तो व्रजवासियों को मानो खोए हुए प्राण वापस मिल गए। यशोदा ने उन्हें छाती से लगा लिया।
इस कथा का संदेश
विष और अहंकार कितना भी बड़ा हो, ईश्वर के चरणों में झुकते ही शांत हो जाता है। भगवान दंड भी देते हैं तो सुधारने के लिए, मिटाने के लिए नहीं।
लोक में प्रसिद्ध है कि कृष्ण गेंद लाने यमुना में कूदे थे; यह प्रसंग भागवत में नहीं, बाद की परंपरा में है। भागवत के अनुसार उन्होंने यमुना को विष से मुक्त करने के लिए छलाँग लगाई थी। वाराणसी के तुलसी घाट पर कार्तिक मास में प्रसिद्ध नाग नथैया लीला होती है।
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