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जटायु का बलिदान

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अरण्य कांड (सर्ग 49–51 और 67–68)

पंचवटी में मारीच के छल से राम और लक्ष्मण दोनों आश्रम से दूर चले गए। सीता को अकेली देखकर रावण संन्यासी का वेश धरकर आया, और फिर अपने असली रूप में आकर उन्हें बलपूर्वक अपने रथ पर बिठा लिया।

आकाश में उड़ता रथ दक्षिण की ओर चला। सीता विलाप करती रहीं, “हे राम! हे लक्ष्मण!” उन्होंने वन, पर्वतों और नदी से पुकारकर कहा कि राम को बताना, रावण मुझे हर ले जा रहा है।

तभी उनकी दृष्टि एक वृक्ष पर बैठे वृद्ध गृध्रराज जटायु पर पड़ी। “आर्य जटायु! देखिए, यह पापी रावण मुझे अनाथ की तरह ले जा रहा है। राम और लक्ष्मण को यह बात अवश्य बताइए।”

जटायु राजा दशरथ के मित्र थे। सीता की पुकार सुनकर वे जाग उठे और रावण से बोले, “दशमुख, मैं साठ हज़ार वर्षों से धर्म का पालन करता आया हूँ। पराई स्त्री का हरण करना किसी राजा को शोभा नहीं देता। सीता को छोड़ दो।”

फिर उन्होंने कहा, “मैं बूढ़ा हूँ और तुम युवा हो, कवच पहने, धनुष-बाण लिए रथ पर सवार हो। फिर भी जब तक मैं जीवित हूँ, तुम सीता को नहीं ले जा सकोगे।”

रावण क्रोध से भर उठा और जटायु पर टूट पड़ा। आकाश में भयंकर युद्ध छिड़ गया: एक ओर दस सिर वाला राक्षसराज, अस्त्र-शस्त्रों से लैस, और दूसरी ओर एक वृद्ध पक्षी, जिसके पास केवल उसके पंख, चोंच और पंजे थे।

जटायु ने अद्भुत पराक्रम दिखाया। अपने पंजों से उन्होंने रावण का धनुष तोड़ दिया, रथ में जुते गधों को मार गिराया, सारथी को भी मार डाला और रथ के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। रावण सीता को गोद में लिए धरती पर आ गिरा।

पर जटायु वृद्ध थे, लड़ते-लड़ते थक गए। अवसर देखकर रावण ने तलवार से उनके पंख, पैर और पार्श्व काट डाले। लहूलुहान जटायु धरती पर गिर पड़े।

सीता दौड़कर उनके पास गईं और उन्हें गले लगाकर ऐसे रोईं जैसे कोई अपने स्वजन के लिए रोता है। पर रावण उन्हें फिर उठाकर आकाश मार्ग से लंका की ओर ले गया।

उधर सीता को खोजते हुए राम और लक्ष्मण उसी स्थान पर पहुँचे। खून से लथपथ जटायु को देखकर राम ने पहले समझा कि यह कोई राक्षस है जिसने सीता को खा लिया है, और धनुष उठा लिया। तब जटायु ने क्षीण स्वर में कहा, “आयुष्मान, जिसे तुम खोज रहे हो, उसे और मेरे प्राणों को, दोनों को रावण हर ले गया।”

उन्होंने बताया कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर गया है। फिर बोले, “रावण ने विंद नाम के मुहूर्त में सीता का हरण किया है। उस मुहूर्त में खोई वस्तु अपने स्वामी को शीघ्र मिल जाती है। शोक मत करो, तुम सीता को अवश्य पाओगे।”

वे रावण के बारे में और बताना चाहते थे, “वह विश्रवा का पुत्र है, कुबेर का भाई…” पर इतना कहते ही उनके प्राण निकल गए।

राम की आँखें भर आईं। “लक्ष्मण, यह गृध्रराज मेरे पिता के समान पूजनीय था। मेरे लिए इसने अपने प्राण दे दिए।” राम ने अपने हाथों से जटायु का अंतिम संस्कार किया, जैसे पुत्र पिता का करता है, और उनके लिए जलांजलि दी। जटायु को उत्तम लोक प्राप्त हुए।

इस कथा का संदेश

जटायु जानते थे कि वे जीत नहीं सकते, फिर भी अन्याय के सामने चुप नहीं रहे। धर्म की रक्षा में किया गया त्याग कभी छोटा नहीं होता।

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