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गोवर्धन लीला

स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, दशम स्कंध (अध्याय 24–27)

व्रज में हर वर्ष बड़ी धूमधाम से इंद्र यज्ञ होता था। एक बार नंद बाबा और सारे गोप उसकी तैयारी में लगे थे। तरह-तरह के पकवान बन रहे थे।

सात वर्ष के कन्हैया ने यह देखा तो पिता से पूछा, “बाबा, यह किसकी पूजा की तैयारी है? इससे क्या मिलता है?”

नंद बाबा ने कहा, “बेटा, इंद्र देव वर्षा करते हैं। वर्षा से घास उगती है, हमारी गायें पलती हैं। इसलिए हम उन्हें प्रसन्न करते हैं।”

कन्हैया ने बड़ी गंभीरता से कहा, “बाबा, हर प्राणी अपने कर्म से सुख-दुख पाता है। हम ग्वाले हैं। हमारा धन हमारी गायें हैं, और हमारी गायों को घास-पानी देने वाला यह गोवर्धन पर्वत है। क्यों न हम गायों, ब्राह्मणों और गोवर्धन की पूजा करें?”

बालक की बात सबको भा गई। उस वर्ष व्रजवासियों ने इंद्र यज्ञ के पकवानों से गोवर्धन की पूजा की, गायों को सजाया और पर्वत की परिक्रमा की। कन्हैया ने स्वयं एक विशाल रूप धरकर कहा, “मैं गोवर्धन हूँ,” और सारा भोग प्रेम से ग्रहण किया।

पर जब इंद्र को पता चला कि उसकी पूजा बंद हो गई है, तो वह क्रोध से भर उठा। उसने प्रलय करने वाले सांवर्तक मेघों को आज्ञा दी: “व्रज को डुबो दो!”

आकाश काला हो गया। मूसलाधार वर्षा, ओले और भयंकर आँधी शुरू हुई। गायें काँपने लगीं, बच्चे रोने लगे। सारे व्रजवासी दौड़ते हुए कन्हैया के पास पहुँचे: “कृष्ण, अब तुम ही बचाओ!”

कन्हैया ने सबको ढाढ़स बँधाया: “डरो मत।” फिर वे गोवर्धन पर्वत के पास गए और उसे एक ही हाथ से ऐसे उठा लिया, जैसे कोई बालक खेल-खेल में कुकुरमुत्ता (छत्रक) उखाड़ लेता है।

पूरा पर्वत उनके हाथ पर छतरी की तरह टिक गया। कन्हैया बोले, “माँ, बाबा, सब अपनी गायों और सामान के साथ इसके नीचे आ जाओ। यह पर्वत गिरेगा नहीं।”

सारे व्रजवासी, गायें, बछड़े, गाड़ियाँ, सब पर्वत के नीचे आ गए। बाहर वर्षा और आँधी का प्रलय चलता रहा, पर भीतर एक बूँद भी नहीं गिरी।

एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, पूरे सात दिन तक कन्हैया भूख-प्यास की परवाह किए बिना, मुस्कुराते हुए, पर्वत उठाए खड़े रहे। व्रजवासी उन्हें निहारते रहे और उनका प्रेम और भी गहरा होता गया।

इंद्र यह देखकर चकित रह गया। उसका अहंकार टूट गया। उसने मेघों को लौटा लिया। आकाश साफ़ हुआ, सूर्य निकला, और कन्हैया ने सबको बाहर आने को कहा। फिर उन्होंने गोवर्धन को धीरे से वहीं रख दिया, जहाँ वह पहले था।

बाद में लज्जित इंद्र, कामधेनु सुरभि के साथ, एकांत में श्रीकृष्ण के पास आया और उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगी: “प्रभु, मैं अपने पद के मद में अंधा हो गया था।”

श्रीकृष्ण ने उसे क्षमा किया और समझाया कि ऐश्वर्य पाकर अहंकार न करे। तब सुरभि ने अपने दूध से और इंद्र ने ऐरावत की सूँड़ से लाए आकाशगंगा के जल से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें गोविंद नाम दिया: गायों के रक्षक।

उसी की स्मृति में दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा होती है, गायों का श्रृंगार होता है, और अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

इस कथा का संदेश

सच्ची पूजा उसकी है जो हमारा पालन करता है: प्रकृति, गाय, धरती। और जो शरण में आता है, भगवान उसके लिए पर्वत भी उठा लेते हैं।

गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, दीपावली के अगले दिन होती है। घरों में गोबर से गोवर्धन बनाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है, गायों को सजाया जाता है, और अनेक पकवानों का अन्नकूट भोग लगाया जाता है। लोक परंपरा और चित्रों में श्रीकृष्ण को बाएँ हाथ की छोटी उँगली पर पर्वत उठाए दिखाया जाता है; भागवत में एक हाथ से उठाने की बात कही गई है।

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