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गंगा अवतरण: भगीरथ की तपस्या
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग 38–44
अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा सगर राज करते थे। उनकी दो रानियाँ थीं। केशिनी से असमंज नाम का पुत्र हुआ, और सुमति से साठ हज़ार पुत्र।
एक बार राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। पर यज्ञ का घोड़ा अचानक गायब हो गया। रामायण बताती है कि इंद्र ने राक्षस का रूप धरकर उसे चुरा लिया था।
सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को घोड़ा ढूँढने भेजा। उन्होंने सारी पृथ्वी छान मारी, और फिर धरती को खोदते-खोदते पाताल तक जा पहुँचे।
वहाँ उन्होंने देखा कि घोड़ा चर रहा है, और पास ही महर्षि कपिल ध्यान में बैठे हैं। सगर-पुत्रों ने बिना सोचे-समझे कपिल को ही चोर मान लिया और शस्त्र उठाकर उन पर दौड़ पड़े।
महर्षि कपिल ने क्रोध से “हुं” का उच्चारण किया, और पल भर में साठ हज़ार सगर-पुत्र राख के ढेर बन गए।
बाद में सगर के पौत्र अंशुमान वहाँ पहुँचे। उन्हें घोड़ा भी मिला और अपने चाचाओं की राख भी। गरुड़ ने उन्हें बताया, “इनका उद्धार साधारण जल से नहीं होगा। केवल स्वर्ग की गंगा का जल ही इन्हें मुक्ति दे सकता है।”
अंशुमान ने जीवन भर तप किया, उनके पुत्र दिलीप ने भी, पर गंगा नहीं आईं। फिर दिलीप के पुत्र भगीरथ राजा बने, और उन्होंने राज्य छोड़कर गोकर्ण में कठोर तपस्या आरंभ की। अंततः ब्रह्मा प्रसन्न हुए और बोले, “गंगा धरती पर आएँगी। पर उनका वेग कौन सहेगा? उसे धरती नहीं झेल पाएगी…”
ब्रह्मा ने कहा, “गंगा के वेग को केवल भगवान शिव ही धारण कर सकते हैं।” तब भगीरथ ने एक वर्ष तक केवल पैर के अँगूठे पर खड़े होकर शिव की उपासना की। शिव प्रसन्न हुए और गंगा को अपने सिर पर धारण करने का वचन दिया।
गंगा स्वर्ग से उतरीं। पर उनके मन में अभिमान था। उन्होंने सोचा, “मैं अपने वेग से शिव को भी बहाकर पाताल ले जाऊँगी।” शिव ने उनका अभिमान जान लिया।
जैसे ही गंगा शिव की जटाओं पर गिरीं, वे उनमें ऐसी उलझ गईं कि बहुत वर्षों तक बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं मिला। वे जटाओं के जाल में ही भटकती रहीं।
भगीरथ ने फिर तपस्या करके शिव को प्रसन्न किया। तब शिव ने गंगा को बिंदु सरोवर की ओर छोड़ दिया। वहाँ से गंगा सात धाराओं में बहीं: तीन पूर्व की ओर, तीन पश्चिम की ओर, और सातवीं धारा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चल पड़ी।
रास्ते में गंगा ने राजर्षि जह्नु के यज्ञ-स्थल को बहा दिया। क्रोधित जह्नु ने गंगा का सारा जल पी लिया। तब देवताओं और ऋषियों ने उनसे प्रार्थना की, और जह्नु ने गंगा को अपने कानों से बाहर निकाल दिया। इसीलिए गंगा जाह्नवी कहलाईं।
भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा समुद्र तक पहुँचीं, और फिर पाताल में उतरीं, जहाँ सगर-पुत्रों की राख पड़ी थी। गंगा का पवित्र जल जैसे ही उस राख पर पड़ा, साठ हज़ार सगर-पुत्रों को मुक्ति मिल गई और वे स्वर्ग चले गए।
ब्रह्मा ने प्रकट होकर भगीरथ से कहा, “तुम्हारे पुरुषार्थ से गंगा धरती पर आई हैं, इसलिए वे तुम्हारी पुत्री भागीरथी कहलाएँगी।” तीन पीढ़ियों का अधूरा काम भगीरथ ने पूरा किया था।
आज भी किसी कठिन काम के लिए अथक परिश्रम को भगीरथ प्रयत्न कहते हैं।
इस कथा का संदेश
जो काम पीढ़ियों से अधूरा हो, वह भी अटल लगन से पूरा होता है। और अभिमान, चाहे गंगा का ही क्यों न हो, शिव के आगे टिकता नहीं।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं। इस दिन गंगा स्नान, दान और गंगा पूजन का विशेष महत्व है।
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