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गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा

स्रोत: शिव पुराण, रुद्र संहिता, कुमार खंड; मल्लिकार्जुन प्रसंग: शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता

कैलाश पर शिव और पार्वती के दो पुत्र थे: बड़े भाई कार्तिकेय, जो देवताओं के सेनापति थे, और गज-मुख वाले गणेश। दोनों बड़े हो गए थे, और माता-पिता उनके विवाह के बारे में सोचने लगे।

पर एक कठिनाई आ खड़ी हुई। दोनों भाई चाहते थे कि पहले उनका विवाह हो। कार्तिकेय कहते, “पहले मेरा।” गणेश कहते, “नहीं, पहले मेरा।” बात सुलझती नहीं दिख रही थी।

तब शिव और पार्वती ने एक उपाय निकाला। उन्होंने कहा, “तुम दोनों में से जो पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौट आएगा, उसी का विवाह पहले होगा।”

यह सुनते ही कार्तिकेय प्रसन्न हो उठे। उनका वाहन मोर था, जो हवा से बातें करता था। बिना एक पल गँवाए वे मोर पर सवार हुए और पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े।

गणेश वहीं खड़े रह गए। उनका शरीर भारी था, और उनका वाहन था एक छोटा-सा मूषक। मोर की गति से मूषक का क्या मुकाबला? पृथ्वी तो अपार है, समुद्र, पर्वत, वन… उसकी परिक्रमा में न जाने कितना समय लगता।

सब सोच रहे थे कि यह होड़ तो शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गई। पर गणेश जी चुपचाप खड़े रहे, आँखें बंद करके कुछ सोचते रहे।

फिर उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई। वे स्नान करने चले गए, और लौटकर उन्होंने माता-पिता से हाथ जोड़कर कहा, “आप दोनों कृपया इन आसनों पर बैठ जाइए। मैं आपकी पूजा करना चाहता हूँ…”

शिव और पार्वती आसनों पर बैठ गए। गणेश ने विधि से उनकी पूजा की, और फिर हाथ जोड़कर उनकी सात बार परिक्रमा की। फिर बोले, “मैंने पृथ्वी की परिक्रमा कर ली है। अब मेरा विवाह कीजिए।”

माता-पिता मुस्कुराए। “पृथ्वी तो बहुत विशाल है, और तुम यहीं से नहीं हिले। यह परिक्रमा कैसे हुई?”

गणेश ने विनम्रता से कहा, “वेद और शास्त्र कहते हैं कि जो अपने माता-पिता की पूजा करके उनकी परिक्रमा करता है, उसे पूरी पृथ्वी की परिक्रमा का फल मिलता है। मेरे लिए आप ही मेरा संसार हैं। और यदि यह सत्य नहीं, तो क्या शास्त्रों के वचन असत्य हैं?”

शिव और पार्वती उनकी बुद्धि देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने माना कि गणेश ने सच कहा है। प्रजापति विश्वरूप की दो पुत्रियाँ, सिद्धि और बुद्धि, से गणेश का विवाह धूमधाम से हुआ। आगे सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नाम के पुत्र हुए।

उधर कार्तिकेय पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे। नारद ने उन्हें सारा समाचार सुनाया। कार्तिकेय के मन को ठेस लगी। उन्होंने माता-पिता को प्रणाम किया, और सबके रोकने पर भी कैलाश छोड़कर दक्षिण में क्रौंच पर्वत पर चले गए।

पुत्र के वियोग में पार्वती व्याकुल हो उठीं। शिव पुराण बताता है कि शिव और पार्वती उनसे मिलने वहाँ जाते हैं, और वहीं शिव मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं, जो आज आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में है।

इस कथा का एक प्रसिद्ध लोक-रूप भी है, जिसमें होड़ विवाह की नहीं, नारद द्वारा लाए गए एक ज्ञान-फल की है। यह रूप विशेष रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है।

इस कथा का संदेश

गति से बड़ी है बुद्धि, और बुद्धि से बड़ी है माता-पिता के प्रति श्रद्धा। जिसका संसार माता-पिता में है, उसके लिए परिक्रमा घर में ही पूरी हो जाती है।

हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। इस दिन गणेश पूजा होती है और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।

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