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गणेश जी का हाथी का सिर

स्रोत: शिव पुराण, रुद्र संहिता, कुमार खंड

कैलाश पर शिव के अनेक गण थे: नंदी, भृंगी और दूसरे। वे सब शिव की आज्ञा मानते थे। एक दिन पार्वती की सखियों जया और विजया ने कहा, “सखी, ये सब शिव के गण हैं। आपका अपना कोई गण होना चाहिए, जो केवल आपकी आज्ञा माने।”

पार्वती को यह बात मन में बैठ गई। एक दिन जब वे स्नान करने जा रही थीं, उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन के मैल से एक सुंदर, बलवान बालक की रचना की और उसमें प्राण डाल दिए।

पार्वती ने उसे पुत्र कहकर गले लगाया, हाथ में एक दंड दिया और कहा, “बेटा, तुम मेरे द्वार पर पहरा दो। मेरी आज्ञा के बिना कोई भी भीतर न आए, चाहे वह कोई भी हो।”

बालक द्वार पर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद स्वयं भगवान शिव वहाँ आए और भीतर जाने लगे। बालक ने दंड आगे करके रास्ता रोक दिया: “माता की आज्ञा के बिना आप भीतर नहीं जा सकते।”

शिव चकित हुए। “तुम जानते नहीं, मैं कौन हूँ? यह मेरा ही घर है।” पर बालक टस से मस न हुआ। शिव ने अपने गणों को भेजा कि इसे समझाओ। गणों ने समझाया, धमकाया, फिर युद्ध किया, पर बालक ने अकेले ही सबको हरा दिया।

बात बढ़ती गई। देवता भी आए, स्वयं भगवान विष्णु भी, पर वह बालक अपनी माँ के वचन पर अडिग खड़ा रहा, और उसके साहस के आगे कोई टिक न सका।

अंत में शिव स्वयं आगे बढ़े। उनकी आँखों में क्रोध था और हाथ में त्रिशूल। द्वार पर खड़ा बालक तब भी नहीं हटा…

शिव ने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। युद्ध थम गया, और शिव के गण उत्सव मनाने लगे।

पर जब यह समाचार पार्वती तक पहुँचा, तो वे दुख और क्रोध से भर उठीं। “मेरे पुत्र को मार डाला गया!” उन्होंने अपनी शक्ति से असंख्य शक्तियों को प्रकट किया और आदेश दिया कि वे सृष्टि का संहार कर दें। चारों ओर प्रलय जैसा दृश्य छा गया।

भयभीत देवता और ऋषि देवर्षि नारद के साथ पार्वती के पास गए और उनकी स्तुति करके क्षमा माँगी। पार्वती ने कहा, “यदि मेरा पुत्र फिर से जीवित हो, और सब देवताओं में उसे पूजनीय स्थान मिले, तभी संसार में शांति होगी।”

शिव ने यह बात मान ली। उन्होंने देवताओं को आदेश दिया, “उत्तर दिशा में जाओ। जो पहला प्राणी मिले, उसका सिर ले आओ।” देवताओं को सबसे पहले एक हाथी मिला, जिसका एक दाँत था। वे उसी का सिर ले आए।

वह सिर बालक के धड़ पर जोड़ा गया। शिव का स्मरण करके उस पर जल छिड़का गया, और बालक जीवित होकर उठ बैठा, पहले से भी अधिक तेजस्वी, सुंदर गज-मुख के साथ।

पार्वती ने आनंद से पुत्र को गले लगा लिया। शिव ने उसे अपना पुत्र स्वीकार किया और घोषणा की, “यह मेरे सब गणों का अध्यक्ष होगा। इसका नाम गणेश होगा, और हर शुभ कार्य में सबसे पहले इसी की पूजा होगी।” ब्रह्मा, विष्णु और सब देवताओं ने इसका अनुमोदन किया।

तभी से हर पूजा, हर शुभ कार्य, “श्री गणेशाय नमः” से शुरू होता है, और गणेश जी विघ्नहर्ता कहलाते हैं।

ध्यान दें कि यह शिव पुराण की कथा है। दूसरे पुराणों में, जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण में, गणेश जी का सिर कटने का कारण कुछ अलग बताया गया है।

इस कथा का संदेश

गणेश जी का पहला गुण है कर्तव्य के प्रति अटल निष्ठा। जो अपने वचन पर टिका रहता है, उसे स्वयं भगवान सबसे ऊँचा स्थान देते हैं।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है, और हर महीने की शुक्ल चतुर्थी को विनायक चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। इस दिन गणेश पूजा में दूर्वा और मोदक अर्पित किए जाते हैं।

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