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द्रौपदी का अक्षय पात्र
स्रोत: महाभारत, वन पर्व (अरण्यक पर्व, अध्याय 3; दुर्वासा प्रसंग प्रचलित पाठ में)
जुए में सब कुछ हारकर पांडव द्रौपदी के साथ वन को चले। बहुत-से ब्राह्मण भी उनके साथ चल पड़े, जो उन्हें छोड़ना नहीं चाहते थे। युधिष्ठिर चिंता में पड़ गए: “वन में मैं इन सबको भोजन कैसे कराऊँगा?”
पुरोहित धौम्य ने उन्हें सूर्य देव की उपासना करने को कहा और सूर्य के एक सौ आठ नाम सिखाए। युधिष्ठिर ने संयम से सूर्य की आराधना की।
सूर्य देव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें तांबे का एक पात्र दिया। “बारह वर्षों तक तुम्हारी रसोई में जो भी पकेगा, फल, मूल, साग या अन्न, वह कभी समाप्त नहीं होगा।”
उस दिन से द्रौपदी पहले अतिथियों, ब्राह्मणों और पतियों को भोजन करातीं, और सबसे अंत में स्वयं खातीं। उनके खा लेने के बाद उस दिन पात्र से कुछ नहीं निकलता था।
उधर दुर्योधन ने क्रोधी स्वभाव के महर्षि दुर्वासा की खूब सेवा की। प्रसन्न होकर ऋषि ने वर माँगने को कहा। दुर्योधन ने कपट से माँगा, “आप अपने शिष्यों के साथ मेरे बड़े भाई युधिष्ठिर के अतिथि बनें, पर तब जाएँ जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हों।”
एक दिन ठीक वैसा ही हुआ। सब भोजन करके विश्राम कर रहे थे, तभी दुर्वासा दस हज़ार शिष्यों के साथ आ पहुँचे। “हम स्नान करके आते हैं, भोजन तैयार रखना।” इतना कहकर वे नदी की ओर चले गए।
द्रौपदी का पात्र खाली था। व्याकुल होकर उन्होंने मन ही मन श्रीकृष्ण को पुकारा। कृष्ण तुरंत आ पहुँचे… पर आते ही बोले, “कृष्णा, मुझे बहुत भूख लगी है। पहले मुझे कुछ खाने को दो।”
द्रौपदी की आँखें भर आईं। “केशव, सूर्य का दिया पात्र तभी तक अन्न देता है जब तक मैं भोजन न कर लूँ। मैं खा चुकी हूँ। अब इसमें कुछ भी नहीं है।”
कृष्ण बोले, “कृष्णा, यह हँसी का समय नहीं है। मैं भूखा हूँ। जल्दी से वह पात्र लाकर मुझे दिखाओ।”
द्रौपदी पात्र ले आईं। कृष्ण ने उसे ध्यान से देखा। किनारे पर साग का एक छोटा-सा अंश और चावल का एक कण चिपका था। कृष्ण ने वही उठाकर खा लिया और कहा, “इससे विश्वात्मा भगवान हरि तृप्त और प्रसन्न हों।”
फिर उन्होंने पांडवों से कहा, “जाओ, ऋषियों को भोजन के लिए बुला लाओ।”
उधर नदी में स्नान कर रहे दुर्वासा और उनके शिष्यों को अचानक ऐसा लगा मानो उन्होंने भरपेट भोजन कर लिया हो। डकारें आने लगीं। शिष्य एक-दूसरे का मुँह देखने लगे: “अब हम भोजन कैसे करेंगे? पांडवों का बनाया भोजन व्यर्थ जाएगा।”
दुर्वासा को राजा अंबरीष की घटना याद आई, जब भगवान के एक भक्त का अपमान करने पर उन्हें बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था। वे समझ गए कि पांडवों की रक्षा स्वयं श्रीहरि कर रहे हैं, और शिष्यों सहित चुपचाप वहाँ से चले गए।
पांडव घाट पर पहुँचे तो वहाँ कोई नहीं था। दुर्योधन की चाल उसी पर उलटी पड़ी।
फिर भी पांडवों के मन में आशंका थी कि कहीं ऋषि रात में लौटकर क्रोध न करें। कृष्ण ने उन्हें आश्वस्त किया, “द्रौपदी ने मुझे पुकारा, इसलिए मैं आया। अब दुर्वासा से डरने की कोई बात नहीं। जो धर्म में स्थिर रहते हैं, उनका अनिष्ट नहीं होता।” फिर वे पांडवों से विदा लेकर द्वारका लौट गए।
इस कथा का संदेश
भक्ति से अर्पित एक कण भी भगवान को तृप्त कर देता है, और जब वे तृप्त होते हैं तो सारा संसार तृप्त हो जाता है। संकट में सच्चे मन की पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती।
सूर्य द्वारा युधिष्ठिर को अक्षय पात्र मिलने की कथा महाभारत के समीक्षित (पुणे) संस्करण के वन पर्व, अध्याय 3 में है। दुर्वासा वाला प्रसंग, और उसके साथ जुड़ी यह बात कि द्रौपदी के खा लेने पर पात्र खाली हो जाता था, प्रचलित पाठ (जैसे नीलकंठ टीका वाले संस्करण) में मिलती है; समीक्षित संस्करण इसे बाद में जुड़ा अंश मानकर परिशिष्ट में रखता है। लोककथाओं में पात्र प्रायः सीधे द्रौपदी को मिला बताया जाता है।
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