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दीपावली: श्रीराम का अयोध्या आगमन
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड (अंतिम सर्ग)
लंका का युद्ध समाप्त हो चुका था। रावण का अंत हुआ, विभीषण लंका के राजा बने, और श्रीराम को सीता जी फिर से मिल गईं। अब घर लौटने का समय था।
विभीषण ने पुष्पक विमान सजाकर श्रीराम को भेंट किया। श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान और वानर सेना के प्रमुख वीर उस पर सवार होकर अयोध्या की ओर उड़ चले।
रास्ते में श्रीराम सीता जी को वे सारे स्थान दिखाते गए: यह सेतु, यह किष्किंधा, यह पंपा सरोवर, यह पंचवटी, जहाँ से तुम्हारा हरण हुआ था… सीता जी की आँखें भर आईं।
पर श्रीराम के मन में एक चिंता थी। चौदह वर्ष पहले, चित्रकूट में भरत ने उनसे कहा था, “भैया, चौदह वर्ष पूरे होने पर यदि उसी दिन आपके दर्शन न हुए, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर लूँगा।”
वनवास के चौदह वर्ष अब पूरे होने को थे। श्रीराम ने विमान प्रयाग में भरद्वाज मुनि के आश्रम पर उतारा और मुनि को प्रणाम किया। मुनि ने बताया कि भरत जटा धारण किए, नंदीग्राम में श्रीराम की पादुकाएँ सिंहासन पर रखकर तपस्वी की तरह राज-काज चला रहे हैं।
श्रीराम ने हनुमान को बुलाया: “तुरंत नंदीग्राम जाओ। भरत को मेरे आने का समाचार दो, और ध्यान से देखना कि यह सुनकर उनके चेहरे पर क्या भाव आता है।”
हनुमान वायु वेग से उड़े। नंदीग्राम पहुँचे तो देखा: वल्कल वस्त्र पहने, दुबले-पतले, उपवास से क्षीण भरत, श्रीराम की पादुकाओं के सामने बैठे थे…
हनुमान ने हाथ जोड़कर कहा, “जिनके लिए आप शोक करते हैं, वे श्रीराम कुशल हैं। रावण को मारकर, सीता जी को पाकर, लक्ष्मण और मित्रों के साथ वे लौट रहे हैं।”
यह सुनते ही भरत आनंद से अचेत होकर गिर पड़े। सँभले, तो उठकर हनुमान को गले लगा लिया और आँसुओं से भीगे स्वर में बोले, “इतना प्रिय समाचार लाने वाले को मैं क्या दूँ!”
भरत ने शत्रुघ्न को आज्ञा दी: “नगर को सजाओ।” अयोध्या की सड़कों पर जल छिड़का गया, फूल बिछाए गए, घरों पर पताकाएँ लहराईं। माताएँ, मंत्री, पुरवासी, सब राम के स्वागत को उमड़ पड़े।
भरत श्रीराम की पादुकाएँ सिर पर रखकर आगे बढ़े। तभी आकाश में चंद्रमा जैसा चमकता पुष्पक विमान दिखाई दिया, और सारी अयोध्या एक स्वर में गूँज उठी: “यह रहे श्रीराम!”
विमान उतरा। भरत ने श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया। श्रीराम ने उन्हें उठाकर गोद में भर लिया। चौदह वर्ष का बिछोह एक क्षण में आँसुओं में बह गया।
भरत ने स्वयं श्रीराम के चरणों में पादुकाएँ पहनाईं और कहा, “भैया, आपकी धरोहर, यह राज्य, मैं आपको लौटाता हूँ। आपके प्रताप से कोष और सेना दस गुना बढ़ गए हैं।”
फिर गुरु वसिष्ठ ने शुभ मुहूर्त में श्रीराम का राज्याभिषेक किया। वाल्मीकि लिखते हैं कि राम के राज्य में न कोई रोग था, न अकाल; सब अपने धर्म में स्थित रहकर सुखी थे।
लोक परंपरा कहती है कि उस रात अयोध्यावासियों ने अपने प्रभु के स्वागत में घर-घर घी के दीपक जलाए। वाल्मीकि रामायण में दीपों का यह वर्णन नहीं है, पर यही भावना पीढ़ियों से दीपावली के दीपों में जलती आ रही है।
इस कथा का संदेश
भरत ने चौदह वर्ष राज्य को अपना नहीं, धरोहर माना। प्रेम, त्याग और प्रतीक्षा का यह मिलन ही दीपावली का सच्चा उजाला है।
दीपावली की संध्या को घर-घर दीपक जलाकर लक्ष्मी-गणेश की पूजा की जाती है, और उत्तर भारत में इसे श्रीराम के अयोध्या लौटने के उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। राम-भरत मिलन और राज्याभिषेक का वर्णन वाल्मीकि रामायण में है; दीप जलाकर स्वागत की बात लोक परंपरा की है।
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