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ध्रुव की तपस्या
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, चतुर्थ स्कंध (अध्याय 8–12); विष्णु पुराण, प्रथम अंश (अध्याय 11–12)
राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं: सुनीति और सुरुचि। राजा को छोटी रानी सुरुचि अधिक प्रिय थीं, और उनका पुत्र उत्तम भी। बड़ी रानी सुनीति के पुत्र थे ध्रुव।
एक दिन राजा उत्तम को गोद में बिठाकर दुलार रहे थे। पाँच वर्ष का ध्रुव भी पिता की गोद में बैठना चाहता था, पर राजा ने उसे पास नहीं बुलाया।
तभी सुरुचि ने गर्व से कहा, “बेटा, तुम राजा के पुत्र तो हो, पर मेरी कोख से नहीं जन्मे। यदि राजसिंहासन चाहिए, तो तप करके भगवान नारायण को प्रसन्न करो और मेरे पुत्र बनकर जन्म लो।” राजा चुप रहे।
अपमान से आहत ध्रुव रोता हुआ माँ के पास पहुँचा। सुनीति की आँखें भर आईं, पर उन्होंने कहा, “बेटा, किसी का बुरा मत सोचो। जो दुख मिटा सकते हैं, वे केवल भगवान हैं। उन्हीं के चरणों की शरण लो।”
ध्रुव उसी क्षण घर छोड़कर चल पड़ा। मार्ग में देवर्षि नारद मिले। उन्होंने परखा, “तुम अभी बालक हो, घर लौट जाओ। बड़े-बड़े योगी भी भगवान को कठिनाई से पाते हैं।” पर ध्रुव अडिग रहा। तब नारद ने उसे मंत्र दिया, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, और यमुना तट के मधुवन भेज दिया।
तपस्या शुरू हुई। पहले महीने ध्रुव तीन-तीन दिन पर केवल फल खाता, दूसरे महीने छह-छह दिन पर सूखी घास और पत्ते, तीसरे महीने नौ-नौ दिन पर केवल जल, और चौथे महीने बारह-बारह दिन पर केवल वायु।
पाँचवें महीने वह साँस रोककर एक पैर पर खड़ा हो गया, मन में केवल भगवान का ध्यान। उसके भार से धरती झुकने लगी, संसार के प्राणियों की साँस रुकने लगी। घबराए देवता भगवान विष्णु की शरण में दौड़े…
भगवान ने देवताओं से कहा, “डरो मत। उस बालक का मन मुझमें लीन है, इसीलिए उसकी साँस के साथ संसार की साँस रुक गई है। मैं स्वयं जाकर उसे इस कठोर तप से लौटाऊँगा।”
भगवान गरुड़ पर सवार होकर मधुवन पहुँचे। ध्रुव जिस रूप का हृदय में ध्यान कर रहा था, वह अचानक भीतर से ओझल हो गया। घबराकर उसने आँखें खोलीं… और वही रूप सामने खड़ा था।
ध्रुव ने धरती पर लेटकर प्रणाम किया। वह भगवान की स्तुति करना चाहता था, पर बालक था, शब्द नहीं जानता था। तब भगवान ने अपने शंख से उसके गाल को छुआ, और उसी क्षण ध्रुव के मुख से ज्ञान से भरी सुंदर स्तुति बह निकली।
भगवान बोले, “बेटा, मैं तुम्हारे मन की बात जानता हूँ। तुम्हें वह पद मिलेगा जो पहले किसी को नहीं मिला: एक अटल लोक, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और सप्तर्षि परिक्रमा करते हैं। पहले तुम छत्तीस हज़ार वर्ष धर्म से राज्य करोगे, फिर उस ध्रुव पद पर पहुँचोगे।”
भगवान अंतर्धान हो गए। पर लौटते हुए ध्रुव का मन भारी था। उसने सोचा, “जो भगवान जन्म-मरण के बंधन से छुड़ा सकते हैं, उनसे मैंने राज्य माँगा! जैसे कोई निर्धन सम्राट के सामने जाकर भी केवल भूसी के कण माँग ले।”
उधर राजा उत्तानपाद अपने व्यवहार पर बहुत पछता रहे थे। पुत्र के लौटने का समाचार सुनते ही वे स्वयं नगर से बाहर आए और ध्रुव को गले लगा लिया। सुनीति ने ही नहीं, सुरुचि ने भी उसे हृदय से आशीर्वाद दिया।
समय आने पर राजा ने ध्रुव को राजसिंहासन सौंपा और स्वयं वन चले गए। ध्रुव ने लंबे समय तक धर्म से प्रजा का पालन किया। अंत में भगवान के पार्षद दिव्य विमान लेकर आए। ध्रुव को माँ सुनीति की याद आई, और उसने देखा कि माँ भी दूसरे विमान में उसके आगे-आगे जा रही हैं।
इस प्रकार वह बालक उस लोक में पहुँचा जो कभी अपनी जगह नहीं छोड़ता। उत्तर के आकाश में अटल चमकने वाले तारे को हम आज भी ध्रुव तारा कहते हैं।
इस कथा का संदेश
जिस बालक को एक गोद नहीं मिली, उसे अटल श्रद्धा और धैर्य ने वह स्थान दिलाया जिसे कोई डिगा नहीं सकता। अपमान को कड़वाहट नहीं, साधना बनाइए।
विष्णु पुराण (प्रथम अंश, अध्याय 11–12) में यही कथा थोड़े अंतर से है: वहाँ घर छोड़ने के बाद ध्रुव को नारद नहीं, सप्तर्षि मिलते हैं और भगवान की आराधना का मार्ग बताते हैं। यहाँ मुख्य रूप से भागवत का वर्णन लिया गया है।
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