हिन्दी
धन्वंतरि का प्राकट्य
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, अष्टम स्कंध (अध्याय 5–9, समुद्र मंथन)
एक समय ऐसा आया जब असुरों से युद्ध में हारकर देवता बलहीन और श्रीहीन हो गए। चिंतित देवता ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।
भगवान ने उपाय बताया: “असुरों से संधि करो और मिलकर क्षीरसागर का मंथन करो। उसमें से अमृत निकलेगा, जिसे पीकर तुम फिर से शक्तिशाली हो जाओगे।”
मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और नागराज वासुकि को रस्सी। पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तो स्वयं भगवान ने विशाल कच्छप का रूप धरकर उसे अपनी पीठ पर थाम लिया।
मंथन शुरू हुआ। सबसे पहले निकला भयंकर हलाहल विष, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक तपने लगे। तब करुणामय भगवान शिव ने उस विष को पीकर कंठ में रोक लिया और नीलकंठ कहलाए।
फिर एक-एक करके रत्न निकलने लगे: कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, अप्सराएँ, और फिर स्वयं माता लक्ष्मी, जिन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया।
पर देवता और असुर जिसके लिए मथ रहे थे, वह अमृत अब तक नहीं निकला था। थके हुए हाथ फिर भी मथते रहे…
तभी समुद्र की लहरें एक अद्भुत प्रकाश से जगमगा उठीं। जल के बीच से एक दिव्य पुरुष ऊपर उठ रहा था: लंबी भुजाएँ, साँवला तेजस्वी शरीर, पीले वस्त्र, गले में माला… और हाथों में एक कलश।
वे थे भगवान धन्वंतरि। भागवत पुराण बताता है कि वे स्वयं भगवान विष्णु के अंश से प्रकट हुए थे, और उनके हाथ के कलश में था अमृत, जिसके लिए यह सारा मंथन हुआ था।
भागवत उन्हें आयुर्वेद का ज्ञाता और यज्ञ में भाग पाने वाला कहता है। उनका नाम ही उनके स्वरूप का परिचय है: वे रोग और पीड़ा को दूर करने वाले, जीवन को बल देने वाले वैद्य हैं।
पर अमृत कलश को देखते ही असुरों का धैर्य छूट गया। वे झपटे और धन्वंतरि के हाथ से कलश छीनकर ले भागे। अब अमृत के लिए असुर आपस में ही झगड़ने लगे: “पहले मैं पिऊँगा!”
देवता निराश होकर फिर भगवान की शरण में गए। तब भगवान विष्णु ने अत्यंत सुंदर मोहिनी रूप धारण किया। मोहिनी के रूप पर मोहित असुरों ने स्वयं ही अमृत कलश उसे सौंप दिया और कहा, “तुम ही इसे बाँट दो।”
मोहिनी ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया और अमृत देवताओं को पिला दिया। अमृत पीकर देवता फिर बलवान हो गए और असुरों पर विजयी हुए।
इस प्रकार धन्वंतरि का प्राकट्य समुद्र मंथन का शिखर था: विष से शुरू हुई यात्रा अमृत पर पूरी हुई। भागवत में भगवान के अवतारों की गिनती में भी धन्वंतरि का नाम आता है, जो अमृत लेकर प्रकट हुए।
आगे चलकर भागवत (नवम स्कंध) में काशी के राजवंश में धन्वंतरि नाम के एक महापुरुष का भी वर्णन है, जिन्हें भगवान का अंश और आयुर्वेद का प्रवर्तक कहा गया है। इसी कारण धन्वंतरि को आरोग्य के देवता और वैद्यों के आराध्य माना जाता है।
इस कथा का संदेश
सच्चा धन है आरोग्य। मंथन की तरह धैर्य से किया गया परिश्रम पहले विष और कठिनाइयाँ लाता है, पर अंत में अमृत देता है।
परंपरा में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) को धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है और इस दिन आरोग्य की कामना से भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। धनतेरस से धन्वंतरि का यह संबंध लोक परंपरा का है; भागवत की कथा में तिथि का उल्लेख नहीं है। मंथन से निकले रत्नों की सूची और उनका क्रम अलग-अलग पुराणों में कुछ भिन्न मिलता है।
कथा पढ़ ली — अब अपनी कुंडली देखें
जन्म तिथि, समय और स्थान से मुफ़्त कुंडली, दशा और ग्रह स्थिति। AI ज्योतिषी से पहले 10 सवाल फ्री — कोई कार्ड नहीं चाहिए।
मुफ़्त कुंडली बनाएँ