हिन्दी
देवउठनी एकादशी: विष्णु का योगनिद्रा से जागना
स्रोत: लोक प्रचलित व्रत कथा (प्रबोधिनी एकादशी); चातुर्मास का विधान पुराणों में
क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर भगवान विष्णु विराजते हैं, और उनके चरणों के पास माता लक्ष्मी। पालनहार होने के कारण भगवान को सृष्टि के हर कोने की चिंता रहती है।
कथा कहती है कि एक समय भगवान विष्णु का कोई नियम नहीं था। कभी वे युगों तक बिना पलक झपकाए जागते रहते और सृष्टि का काम सँभालते, और कभी जब सोते, तो लाखों-करोड़ों वर्षों के लिए गहरी निद्रा में चले जाते।
उनकी इस लंबी निद्रा में सृष्टि का संतुलन डगमगा जाता। और लगातार जागने के दिनों में न देवताओं को उनके दर्शन का अवसर मिलता, न माता लक्ष्मी को विश्राम का।
एक दिन माता लक्ष्मी ने बड़े प्रेम से भगवान के चरण दबाते हुए कहा, “नाथ, आप दिन-रात जागते हैं, और जब सोते हैं तो युगों के लिए। इससे सृष्टि भी व्याकुल होती है और आपकी सेवा करने वाले भी।”
“यदि आप नियम से, हर वर्ष कुछ समय के लिए विश्राम करें, तो मुझे भी आपकी सेवा का सुख मिले, देवताओं को भी कुछ विश्राम मिले, और सृष्टि का क्रम भी सधा रहे।”
भगवान विष्णु कुछ क्षण चुप रहे। फिर मुस्कुराए। माता लक्ष्मी की बात में केवल अपना सुख नहीं, सारी सृष्टि की भलाई छिपी थी।
भगवान ने कहा, “देवी, तुमने ठीक कहा। आज से मैं एक नियम बनाता हूँ…”
भगवान बोले, “हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी को मैं योगनिद्रा में जाऊँगा, और चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागूँगा। मेरी यह निद्रा अल्प होगी, प्रलय की महानिद्रा नहीं।”
“इन चार महीनों में जो भक्त संयम से रहेंगे, मेरा स्मरण करेंगे, कथा-कीर्तन करेंगे, उनके घर मैं तुम्हारे साथ निवास करूँगा।”
तब से आषाढ़ शुक्ल एकादशी देवशयनी एकादशी कहलाती है, और ये चार महीने चातुर्मास। इन महीनों में साधु-संत एक स्थान पर रहकर तप करते हैं, और गृहस्थ विवाह जैसे बड़े मांगलिक कार्य नहीं करते। इन दिनों भक्त विशेष रूप से जप, दान, व्रत और कथा-श्रवण में मन लगाते हैं।
चार महीने पूरे होते हैं, और कार्तिक शुक्ल एकादशी आती है: देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी। परंपरा कहती है कि इस दिन देवता, ऋषि और भक्त शंख, घंटे, मृदंग और वेद मंत्रों से भगवान की स्तुति करके उन्हें जगाते हैं।
धरती पर भी घर-घर यही उत्सव होता है। आँगन में गेरू और चावल के आटे से भगवान के चरण बनाए जाते हैं, गन्ने का मंडप सजता है, नए अन्न, सिंघाड़े, बेर और शकरकंद चढ़ाए जाते हैं।
फिर थाली बजाकर, दीप जलाकर, स्त्रियाँ मिलकर गाती हैं: “उठो देवा, बैठो देवा…” मानो किसी प्रियजन को प्रेम से नींद से जगा रही हों।
भगवान के जागते ही सृष्टि में फिर से मंगल का समय शुरू होता है। उसी दिन या अगले दिन तुलसी जी का शालिग्राम से विवाह होता है, और उसके बाद शादियों का मौसम लौट आता है।
इस प्रकार देवउठनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, प्रतीक्षा के बाद मिलन का उत्सव है: भगवान का अपने भक्तों से, और भक्तों का अपने भगवान से।
इस कथा का संदेश
विश्राम भी सृष्टि के नियम का हिस्सा है। और जिस घर में प्रेम से भगवान को जगाया जाता है, वहाँ मंगल स्वयं जाग उठता है।
देवउठनी एकादशी पर भक्त व्रत रखते हैं, संध्या को आँगन में भगवान के चरण बनाकर, गन्ने का मंडप सजाकर और शंख-घंटे बजाकर भगवान विष्णु को जगाते हैं, और तुलसी विवाह करते हैं। चातुर्मास और हरि-शयन का विधान पुराणों में है; लक्ष्मी जी के आग्रह वाली यह कथा लोक परंपरा में प्रचलित है। कुछ क्षेत्रों में देवशयनी की कथा राजा बलि से भी जोड़ी जाती है, जिनके द्वार पर भगवान चार महीने रहते हैं।
कथा पढ़ ली — अब अपनी कुंडली देखें
जन्म तिथि, समय और स्थान से मुफ़्त कुंडली, दशा और ग्रह स्थिति। AI ज्योतिषी से पहले 10 सवाल फ्री — कोई कार्ड नहीं चाहिए।
मुफ़्त कुंडली बनाएँ