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दक्ष यज्ञ और सती

स्रोत: श्रीमद्भागवत, चतुर्थ स्कंध, अध्याय 2–7; शिव पुराण, रुद्र संहिता, सती खंड

प्रजापति दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। पर दक्ष के मन में शिव के लिए आदर नहीं था। उन्हें शिव का भस्म, श्मशान और भूत-गण वाला वेश अच्छा नहीं लगता था।

एक बार प्रजापतियों की एक बड़ी सभा में दक्ष आए। सब देवता और ऋषि उनके सम्मान में खड़े हो गए, पर ब्रह्मा और शिव अपने आसन पर बैठे रहे। दक्ष को लगा कि दामाद होकर भी शिव ने उनका अपमान किया है। उन्होंने भरी सभा में शिव को कटु वचन कहे और शाप दिया।

समय बीता। दक्ष ने एक विशाल यज्ञ आरंभ किया। सब देवताओं, ऋषियों और अपनी सब पुत्रियों के परिवारों को बुलाया, पर शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा।

कैलाश पर सती ने आकाश में विमानों को जाते देखा। देव-पत्नियाँ सज-धजकर उसी ओर जा रही थीं। पता चला कि पिता के घर यज्ञ है। सती का मन मायके जाने के लिए व्याकुल हो उठा।

शिव ने उन्हें प्रेम से समझाया, “देवी, जहाँ मन में द्वेष हो, वहाँ बिना बुलाए जाना ठीक नहीं। वहाँ तुम्हारा अपमान होगा, और वह तुम सह नहीं पाओगी।”

पर सती का मन नहीं माना। वे शिव के गणों के साथ पिता के घर पहुँच गईं। माँ और बहनों ने तो स्नेह से गले लगाया, पर दक्ष ने उनकी ओर देखा तक नहीं।

फिर सती ने यज्ञ-मंडप में देखा। हर देवता का भाग रखा गया था, पर भगवान शिव का कोई भाग नहीं था। सती का मुख क्रोध से तमतमा उठा…

सती ने पूरी सभा के सामने अपने पिता से कहा, “जिन शिव का नाम लेने मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं, आप उनसे द्वेष करते हैं? जो शरीर आपसे मिला है, मैं उसे अब नहीं रखूँगी।”

सती उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ गईं, आचमन किया और योग में स्थित हो गईं। उन्होंने अपने भीतर योगाग्नि प्रज्वलित की, और सबके देखते-देखते उनका शरीर उसी अग्नि में भस्म हो गया।

चारों ओर हाहाकार मच गया। देवर्षि नारद ने यह समाचार कैलाश पहुँचाया। सुनते ही शिव का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़कर धरती पर पटकी, और उससे प्रचंड, विशालकाय वीरभद्र प्रकट हुए।

शिव ने आदेश दिया, “जाओ, दक्ष और उसके यज्ञ को नष्ट कर दो।” वीरभद्र शिव के गणों के साथ यज्ञ-स्थल पर टूट पड़े। यज्ञ-मंडप उजड़ गया, और वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया।

भयभीत देवता ब्रह्मा जी को साथ लेकर कैलाश पहुँचे। ब्रह्मा ने शिव की स्तुति की और विनती की, “प्रभु, आप ही यज्ञ के स्वामी हैं। दक्ष को क्षमा करें और यज्ञ को पूरा होने दें।”

करुणामय शिव का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कहा कि दक्ष को यज्ञ के बकरे का सिर लगा दिया जाए। ऐसा ही हुआ, और दक्ष जीवित हो उठे। अब उनका अहंकार मिट चुका था। उन्होंने हाथ जोड़कर शिव की स्तुति की और क्षमा माँगी।

इसके बाद शिव के भाग के साथ यज्ञ विधिपूर्वक पूरा हुआ। उधर सती ने अगले जन्म में हिमालय और मेना की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया, और फिर से शिव को पति रूप में पाया।

बाद के कुछ पुराणों और लोक परंपरा में यह भी आता है कि शिव सती के शरीर को लेकर विचलित होकर घूमे, और जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। यह प्रसंग भागवत और शिव पुराण की इस कथा में नहीं है।

इस कथा का संदेश

अहंकार यज्ञ को भी नष्ट कर देता है, और विनम्रता टूटे को भी जोड़ देती है। सम्मान जहाँ न हो, वहाँ प्रेम भी दुख पाता है।

हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है। इस दिन शिव-पार्वती की पूजा और शिव कथा का पाठ शुभ माना जाता है।

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