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ब्रह्मचारिणी

स्रोत: शिव पुराण, रुद्र संहिता, पार्वती खंड; कालिदास का कुमारसंभव; नवदुर्गा परंपरा

हिमालय की पुत्री पार्वती रोज़ समाधि में लीन शिव की सेवा करती थीं। उसी समय तारकासुर के अत्याचार से दुखी देवताओं ने कामदेव को भेजा, ताकि शिव का ध्यान पार्वती की ओर जाए।

कामदेव ने बाण चलाया। शिव की समाधि टूटी, और उन्होंने क्रोध से तीसरा नेत्र खोल दिया। पल भर में कामदेव भस्म हो गए। शिव वहाँ से अंतर्धान हो गए, और पार्वती अकेली खड़ी रह गईं।

पार्वती ने समझ लिया कि रूप और सेवा से शिव को नहीं पाया जा सकता। देवर्षि नारद ने उन्हें “ॐ नमः शिवाय” का मंत्र दिया, और पार्वती ने तप करने का निश्चय किया।

माँ मेना ने रोका। कवि कालिदास बताते हैं कि माँ के मुँह से निकला “उ मा”, यानी “अरी, ऐसा मत कर”, और तभी से पार्वती का एक नाम उमा पड़ा। पर पार्वती का निश्चय अटल था।

उन्होंने राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए और वल्कल पहन लिए। पहले वे फल खाकर रहीं, फिर केवल पत्ते, और फिर पत्ते भी छोड़ दिए। इसीलिए वे अपर्णा कहलाईं। गर्मी में अग्नि के बीच और सर्दी में जल में खड़ी होकर वे शिव का जप करती रहीं।

एक दिन उनके आश्रम में एक जटाधारी युवा ब्रह्मचारी आया। पार्वती ने आदर से उसका सत्कार किया। उसने पूछा, “देवी, इतनी कठोर तपस्या किसके लिए?” सखी ने बताया, “शिव को पति रूप में पाने के लिए।”

ब्रह्मचारी हँस पड़ा। “शिव? जो श्मशान में रहते हैं, भस्म लगाते हैं, सर्प लपेटते हैं, जिनका न कुल पता है न घर? तुम जैसी राजकुमारी उनके लिए अपना जीवन गँवा रही हो?”

पार्वती का मुख क्रोध से लाल हो गया। उन्होंने कहा, “तुम शिव को नहीं जानते। वे निर्गुण भी हैं और सबके आधार भी। जो भस्म वे लगाते हैं, वह भी पवित्र है। लोग जिसे अमंगल कहते हैं, वह उनके स्पर्श से मंगल हो जाता है।”

“मेरा मन शिव में लगा है, और लगा रहेगा। जो शिव की निंदा करता है, उसकी बात सुनना भी पाप है।” यह कहकर उन्होंने सखी से कहा कि इसे रोको, यह फिर कुछ बोलना चाहता है। और वे स्वयं वहाँ से उठकर जाने लगीं।

तभी वह ब्रह्मचारी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गया। सामने स्वयं भगवान शिव खड़े थे। उन्होंने पार्वती का हाथ थाम लिया और कहा, “देवी, मैं तुम्हारी तपस्या से खरीदा हुआ दास हूँ। आज से मैं तुम्हारा हूँ।”

शिव पुराण बताता है कि इससे पहले शिव ने सप्तर्षियों को भी पार्वती की परीक्षा लेने भेजा था। उन्होंने भी शिव के दोष गिनाए और किसी और से विवाह की सलाह दी, पर पार्वती डिगी नहीं। अब स्वयं शिव ने उनके प्रेम और निष्ठा को परख लिया था।

पार्वती का तप पूरा हुआ। शिव ने सप्तर्षियों को हिमवान के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर भेजा, और शिव-पार्वती विवाह की तैयारी शुरू हुई। इसी विवाह से आगे कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्होंने तारकासुर का अंत किया।

नवरात्रि के दूसरे दिन देवी के इसी तपस्विनी रूप की पूजा ब्रह्मचारिणी के नाम से होती है। ब्रह्म यानी तप, और चारिणी यानी आचरण करने वाली। उनके एक हाथ में जप की माला और दूसरे में कमंडलु है, और वे नंगे पैर चलती हैं।

ब्रह्मचारिणी का रूप याद दिलाता है कि बड़ा लक्ष्य एक दिन में नहीं मिलता। धूप, सर्दी, निंदा और परीक्षा, सबके बीच जो अपने संकल्प पर टिका रहता है, उसके पास अंत में लक्ष्य स्वयं चलकर आता है।

इस कथा का संदेश

सच्ची लगन निंदा से नहीं डगमगाती। तप, धैर्य और अटल निष्ठा से असंभव भी संभव हो जाता है।

शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन, द्वितीया को, माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है।

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