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भीष्म प्रतिज्ञा
स्रोत: महाभारत, आदि पर्व (संभव पर्व)
हस्तिनापुर के राजा शांतनु और देवी गंगा के पुत्र थे देवव्रत। उन्होंने महर्षि वसिष्ठ से वेद और परशुराम से शस्त्र-विद्या सीखी थी। उनके गुणों से प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें युवराज बना दिया।
कुछ वर्ष बाद राजा शांतनु यमुना के किनारे वन में घूम रहे थे। तभी हवा में एक अद्भुत सुगंध आई। उसका पीछा करते हुए वे एक सुंदर कन्या तक पहुँचे, जो नदी में नाव चलाती थी। वह थी निषादराज की पुत्री सत्यवती।
राजा ने निषादराज से सत्यवती का हाथ माँगा। निषादराज ने आदर से कहा, “महाराज, कन्या तो किसी को देनी ही है। पर मेरी एक शर्त है: इसका पुत्र ही आपके बाद राजा बने।”
शांतनु यह वचन नहीं दे सके। उनका सुयोग्य पुत्र देवव्रत युवराज था। वे चुपचाप लौट आए, पर मन वहीं छूट गया। राजा उदास और चिंतित रहने लगे।
देवव्रत ने पिता से चिंता का कारण पूछा, पर राजा ने बात टाल दी। तब देवव्रत ने पिता के वृद्ध मंत्री से सारा सच जाना, और कुछ वृद्ध क्षत्रियों को साथ लेकर स्वयं निषादराज के पास पहुँच गए।
निषादराज ने वही शर्त दोहराई। देवव्रत ने बिना एक पल सोचे कहा, “मैं वचन देता हूँ, इस कन्या का पुत्र ही हमारा राजा होगा। मैं राज्य का अधिकार छोड़ता हूँ।”
पर निषादराज अब भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं थे। “युवराज, आप अपने वचन के पक्के हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। पर आपके जो पुत्र होंगे, क्या वे भी इस वचन को मानेंगे?”
देवव्रत ने सबके सामने कहा, “निषादराज, सुनो। राज्य तो मैं पहले ही छोड़ चुका हूँ। अब संतान के विषय में भी निश्चय करता हूँ। आज से मैं आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेता हूँ। मेरी कोई संतान नहीं होगी। पुत्र न होने पर भी मुझे अक्षय पुण्यलोक प्राप्त होंगे।”
जिस युवराज के सामने पूरा राजपाट और सुखी गृहस्थ जीवन था, उसने एक ही पल में दोनों का त्याग कर दिया, केवल इसलिए कि उसके पिता का दुख दूर हो सके।
यह सुनकर निषादराज रोमांचित हो उठे और बोले, “तब मैं अपनी पुत्री आपके पिता को देता हूँ।”
उसी क्षण आकाश से अप्सराओं और देवताओं ने फूल बरसाए, और सबने एक स्वर में कहा, “यह भीष्म है!” भीष्म, यानी जिसने भीषण, अत्यंत कठोर प्रतिज्ञा की हो। उसी दिन से देवव्रत संसार में भीष्म कहलाए।
फिर भीष्म ने सत्यवती से कहा, “माता, रथ पर बैठिए। अब हम अपने घर चलें।” वे उन्हें हस्तिनापुर ले आए और पिता को सारी बात बताई।
पुत्र के इस दुष्कर त्याग की बात सुनकर शांतनु का हृदय भर आया। उन्होंने भीष्म को वरदान दिया, “जब तक तुम जीना चाहोगे, मृत्यु तुम्हें छू नहीं सकेगी। तुम्हारी मृत्यु तुम्हारी इच्छा के अधीन होगी।”
भीष्म ने यह प्रतिज्ञा जीवन भर निभाई। उन्होंने सत्यवती के पुत्रों चित्रांगद और विचित्रवीर्य को राजगद्दी पर बिठाया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तिनापुर की रक्षा करते रहे, पर स्वयं कभी सिंहासन पर नहीं बैठे।
बहुत वर्षों बाद, कुरुक्षेत्र के युद्ध में बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म ने इसी वरदान के बल पर सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की, और तभी शरीर त्यागा। उसी शय्या पर लेटे-लेटे उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म और जीवन के गहरे उपदेश भी दिए।
इस कथा का संदेश
भीष्म ने पिता के सुख के लिए अपना पूरा भविष्य दे दिया। सच्चा वचन वही है जो बिना शर्त, जीवन भर निभाया जाए।
माघ शुक्ल अष्टमी को भीष्म अष्टमी मनाई जाती है, जिसे भीष्म के देह-त्याग का दिन माना जाता है। इस दिन उनके निमित्त तर्पण करने की परंपरा है।
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