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अहल्या उद्धार
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग 48–49
महर्षि विश्वामित्र, राम और लक्ष्मण को साथ लेकर मिथिला की ओर जा रहे थे। नगर के पास उन्हें एक पुराना आश्रम दिखा: सुंदर, पर बिल्कुल सूना। न कोई ऋषि, न कोई हलचल।
राम ने पूछा, “गुरुदेव, यह आश्रम किसका है, और यहाँ ऐसा सन्नाटा क्यों है?” विश्वामित्र बोले, “राम, यह महर्षि गौतम का आश्रम है। सुनो इसकी कथा।”
“यहाँ गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ वर्षों तक तप करते रहे। एक दिन जब गौतम आश्रम से बाहर गए थे, तब देवराज इंद्र गौतम का वेश धरकर अहल्या के पास आए।”
“अहल्या ने उन्हें पहचान लिया, फिर भी उस क्षण उनका मन भटक गया और उनसे भूल हो गई। इंद्र लौट ही रहे थे कि गौतम स्नान करके आश्रम लौट आए।”
“अपने ही वेश में इंद्र को देखकर गौतम सब समझ गए। उन्होंने इंद्र को शाप दिया, और फिर अहल्या की ओर मुड़े।”
“‘तुम हज़ारों वर्षों तक इसी आश्रम में, केवल वायु पीकर, बिना भोजन के, भस्म पर लेटी तप करोगी। कोई प्राणी तुम्हें देख नहीं पाएगा।’ फिर बोले, ‘जब दशरथ-पुत्र राम इस वन में आएँगे और तुम उनका आतिथ्य करोगी, तब तुम पवित्र होकर फिर मेरे पास लौटोगी।’ इतना कहकर गौतम हिमालय चले गए।”
कथा कहकर विश्वामित्र रुके, और राम की ओर देखा। “राम, वह समय आ गया है। इस आश्रम में प्रवेश करो।”
राम ने विश्वामित्र को आगे करके, लक्ष्मण के साथ आश्रम में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने अहल्या को देखा: तप से दीप्त, जैसे धुएँ से घिरी अग्नि की लौ, जैसे कोहरे में छिपी चंद्रमा की चाँदनी। जिन्हें अब तक देवता और असुर भी नहीं देख पाते थे, वे राम के आते ही दिखाई देने लगीं।
राम और लक्ष्मण ने आगे बढ़कर आदरपूर्वक अहल्या के चरण छुए। गौतम के वचन याद करती हुई अहल्या ने दोनों भाइयों का स्वागत किया, उन्हें पाद्य और अर्घ्य दिया, और राम ने विधिपूर्वक उनका आतिथ्य स्वीकार किया।
उसी क्षण आकाश से पुष्प-वर्षा हुई, दुंदुभियाँ बज उठीं, और देवताओं ने अहल्या की प्रशंसा की। अपने लंबे तप से वे पूरी तरह शुद्ध हो चुकी थीं।
महातपस्वी गौतम भी लौट आए। उन्होंने अहल्या को फिर से अपने साथ स्वीकार किया और राम का पूजन किया। फिर दोनों साथ-साथ तप में लीन हो गए, और राम विश्वामित्र के साथ आगे मिथिला की ओर चल दिए।
मिथिला पहुँचने पर राजा जनक के पुरोहित शतानंद, जो गौतम और अहल्या के ही पुत्र थे, यह समाचार सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने विश्वामित्र से उत्सुकता से पूछा कि क्या राम ने उनकी तपस्विनी माता के दर्शन किए, क्या उनका आतिथ्य स्वीकार किया, और फिर राम के प्रति गहरा आभार प्रकट किया।
वाल्मीकि की कथा में अहल्या का उद्धार किसी चमत्कारी स्पर्श से नहीं होता। वह होता है उनके अपने लंबे तप और पश्चाताप से, और राम के उस व्यवहार से जिसमें तिरस्कार नहीं, केवल सम्मान था।
जिस स्त्री को संसार ने भुला दिया था, उसके चरण छूकर और उसका आतिथ्य स्वीकार करके राम ने उसे फिर से गरिमा का स्थान दिया। उन्होंने न उसका अतीत पूछा, न कोई निर्णय सुनाया; बस एक महान तपस्विनी के रूप में उसका सम्मान किया। यही इस कथा का सबसे सुंदर क्षण है।
इस कथा का संदेश
भूल किसी से भी हो सकती है; सच्चा पश्चाताप और दूसरों का सम्मान भरा व्यवहार जीवन में फिर से उजाला ला सकता है।
वाल्मीकि रामायण में अहल्या पत्थर नहीं बनतीं; वे अदृश्य रहकर तप करती हैं। बाद की रचनाओं, जैसे अध्यात्म रामायण और गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस में, वे शाप से शिला बन जाती हैं और राम के चरण-स्पर्श से फिर स्त्री रूप पाती हैं। लोक में यही रूप अधिक प्रसिद्ध है।
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